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जब ‘समर्थक’ बने ‘तस्कर’ और सियासत का मंच बना अपराध की पाठशाला

जब ‘समर्थक’ बने ‘तस्कर’ और सियासत का मंच बना अपराध की पाठशाला

गांजा, गाड़ी और गुमराहगी का गठजोड़ युवा मोर्चा के गाड़ी में  नशा माफिया का खेल!
कहते हैं कि राजनीति समाजसेवा का माध्यम होती है, लेकिन जब यही राजनीति अपनी छवि सुधारने के बजाए अपने समर्थकों के माध्यम से गांजे की गंध फैलाने लगे, तो सवाल उठना लाजमी है। ताज़ा मामला छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा मरवाही जिले का है, जहां “भाजपा समर्थक मंच युवा मोर्चा महामंत्री” लिखी एक गाड़ी में गांजे का जखीरा पकड़ा गया। इसके साथ पांच आरोपी भी गिरफ्तार हुए। इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर “समर्थक” होने का मतलब क्या है? समर्थन समाज सुधार का या मादक पदार्थ तस्करी का?
छत्तीसगढ़ पुलिस के एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स ने जब खोडरी जंगल के रास्ते गांजा तस्करी के इस मामले को उजागर किया, तो पूरा मामला किसी सस्पेंस फिल्म की पटकथा जैसा निकला। पकड़ी गई गाड़ियों में से एक पर लिखा था – “भाजपा समर्थक मंच युवा मोर्चा महामंत्री”। ऐसा प्रतीत हुआ मानो गाड़ी ने खुद अपने मालिक की करतूतों का पोस्टर बनकर आत्मसमर्पण कर दिया हो।
73 किलो गांजा, जिसकी कीमत करीब 7 लाख 35 हजार बताई जा रही है, एक ब्रेजा और स्विफ्ट डिजायर में ठूंस-ठूंसकर भरा गया था। ऐसा लग रहा था जैसे वाहन, जो कभी वोटरों को रैलियों तक पहुंचाने का जरिया थे, अब नशे के अड्डे तक सामान पहुंचाने का साधन बन गए हों।
गाड़ियों की नंबर प्लेट पर “महामंत्री” लिखे होने के साथ, यह भी साफ था कि आरोपी अपराध से ज्यादा अपने ओहदे की मार्केटिंग में विश्वास रखते थे। शायद यह सोचते थे कि महामंत्री के नाम के आगे कानून का डर फीका पड़ जाएगा।
भाजपा की पल्ला झाड़ने की कला
जब यह मामला सार्वजनिक हुआ, तो भाजपा नेताओं ने फौरन इस कथित मंच से दूरी बना ली। जिला अध्यक्ष हीरा सिंह श्याम ने बयान जारी किया
“भाजपा समर्थित मंच युवा मोर्चा नाम का कोई संगठन हमारे साथ नहीं है। हम ऐसे संगठनों और लोगों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे, जो हमारे नाम का दुरुपयोग करते हैं।”
युवा मोर्चा जिला अध्यक्ष रवि राठौर ने भी वही राग अलापा
“ऐसे किसी संगठन का भाजपा से कोई लेना-देना नहीं है।”
लेकिन सवाल उठता है कि जब यह मंच अपने बैनर में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और स्थानीय नेताओं की तस्वीरें धड़ल्ले से उपयोग कर रहा था, तब पार्टी क्यों चुप थी? क्या यह पार्टी की निष्क्रियता का प्रतीक नहीं है, या फिर जानबूझकर अनजान बनने की कला?
गांजा तस्करी और राजनीति का नया गठजोड़
इस मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब गाड़ियों पर मीडिया या प्रेस का लेबल अपराधियों को छिपने का मौका देता है, तो “महामंत्री” या “समर्थक” जैसे पदनाम क्या अपराध का लाइसेंस बन गए हैं?
गांजा, गाड़ी और गुमराही का फलसफा
इस घटना को  देखा जाए, तो जिस गाड़ी, को समाज की सेवा और जनता की आवाज बनने के लिए बनाई गई थी, अब नशे का सामान ढो रही है।
गांजा पकड़े जाने के बाद आरोपियों के चेहरे पर शिकन नहीं, बल्कि यह एहसास था कि वे गलत जगह पकड़े गए। शायद उनकी योजना किसी और रास्ते पर कामयाब होती, लेकिन पुलिस के जागरूकता ने उनके इरादों को कुचल दिया।
प्रेस और मीडिया लिखी गाड़ियों का दुरुपयोग

पत्रकारिता का क्षेत्र पहले ही चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में, प्रेस और मीडिया लिखी गाड़ियों का अपराधियों द्वारा दुरुपयोग इस क्षेत्र की साख पर और भी गहरा धब्बा लगा रहा है। वरिष्ठ पत्रकारों की यह मांग जायज़ है कि प्रेस और मीडिया लिखी गाड़ियों की सख्त जांच हो और गलत इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
जब राजनीति पर साख का संकट हो
इस घटना ने दिखा दिया कि राजनीति और अपराध का गठजोड़ समाज को कितना नुकसान पहुंचा सकता है। भाजपा भले ही इस संगठन से पल्ला झाड़ रही हो, लेकिन सवाल यह है कि ऐसे तथाकथित समर्थक संगठनों की गतिविधियों पर नजर क्यों नहीं रखी जाती? यह मामला सिर्फ गांजे की तस्करी का नहीं है, बल्कि राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण और नैतिक गिरावट का नमूना है।

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