जबलपुर मुख्य पीठ ने अशिता दुबे एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश शासन (डब्ल्यूपी नंबर 5901/2019) सहित अन्य सभी संबंधित याचिकाओं पर लंबी सुनवाई पूरी करने के बाद यह अंतिम निर्णय सुनाया है। इस फैसले से राज्य की पूरी भर्ती प्रक्रिया और सियासी गलियारों में भूचाल आ गया है।
🔍 फैसले के 4 मुख्य संवैधानिक व सांख्यिकीय आधार
माननीय न्यायालय ने अपने 159 पन्नों के आदेश में सरकार के इस कदम को खारिज करने के लिए बेहद पुख्ता तकनीकी और कानूनी कारण दिए हैं:
- 50% की संवैधानिक सीमा का उल्लंघन: [दैनिक भास्कर की रिपोर्ट] के मुताबिक याचिकाकर्ताओं की सबसे मजबूत दलील यह थी कि ओबीसी कोटा 27% करने से राज्य में कुल आरक्षण (SC-16%, ST-20%, OBC-27%) बढ़कर 63 प्रतिशत हो रहा था, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के 10% को मिलाकर और अधिक हो जाता था। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘इन्द्रा साहनी’ और ‘जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल’ मामलों का हवाला देते हुए कहा कि कुल आरक्षण की सीमा 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
- ‘असाधारण परिस्थितियों’ को साबित करने में नाकामी: कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार अदालत के समक्ष ऐसी कोई भी “असाधारण परिस्थिति या आपातकालीन स्थिति” (Extraordinary Conditions) के पुख्ता सांख्यिकीय आंकड़े या संवैधानिक आधार पेश नहीं कर सकी, जिसके तहत 50% की तय सीमा को लांघा जा सके।
- सिर्फ आबादी पैमाना नहीं: अदालत ने कहा कि केवल किसी वर्ग की आबादी अधिक होना आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने का एकमात्र और पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
- ओबीसी का पर्याप्त प्रतिनिधित्व: उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों, आंकड़ों और तालिकाओं की बारीकी से जांच करने के बाद खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि राज्य की लोक सेवाओं (सरकारी नौकरियों) में ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व पहले से ही पर्याप्त और संतोषजनक है।
💼 वर्तमान सरकारी नौकरियों, भर्ती परीक्षाओं और पूर्व नियुक्तियों पर क्या होगा असर?
इस फैसले ने उन हजारों युवाओं की असमंजसता को दूर कर दिया है जो पिछले कई सालों से ’87-13 फीसदी’ के फॉर्मूले के कारण रिजल्ट और जॉइनिंग के लिए अटके हुए थे:
| श्रेणी (Category) | कोर्ट का अंतिम दिशा-निर्देश और आदेश |
|---|---|
| होल्ड पर रखे गए 13% पद | [आजतक की रिपोर्ट] के अनुसार, सितंबर 2022 से सरकारी नौकरियों में होल्ड पर रखे गए इस 13% कोटे के सभी पदों को आगामी 3 महीने के भीतर अनिवार्य रूप से अनारक्षित (Unreserved/General) वर्ग के अभ्यर्थियों से भरने का आदेश दिया गया है। |
| पुरानी नियुक्तियां (2019 से 2022) | राहत: अदालत ने 8 मार्च 2019 से लेकर 29 सितंबर 2022 (जब सामान्य प्रशासन विभाग ने अंतरिम राहत स्पष्ट की थी) के बीच 27% कोटे के तहत हो चुकीं ओबीसी नियुक्तियों को पूरी तरह सुरक्षित रखा है; इन कर्मचारियों की नौकरी नहीं जाएगी। |
| बाद की नियुक्तियां (सितंबर 2022 के बाद) | 29 सितंबर 2022 के बाद 14% से अधिक के बढ़े हुए कोटे के तहत की गई नियुक्तियों को अदालत ने शून्य और अमान्य (Null and Void) घोषित कर दिया है। |
| भविष्य की भर्ती प्रक्रियाएं | MPPSC (लोक सेवा आयोग) और ESB (कर्मचारी चयन मंडल) जैसी सभी भर्ती एजेंसियों को अब तत्काल प्रभाव से परिणाम इसी 14% ओबीसी कोटे के आधार पर संशोधित कर घोषित करने होंगे। |
🏛️ पृष्ठभूमि (Chronology): कहां से शुरू हुआ था यह पूरा विवाद?
- 8 मार्च 2019: मध्य प्रदेश की तत्कालीन कमलनाथ (कांग्रेस) सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर राज्य में ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने का बड़ा फैसला लिया था।
- 14 अगस्त 2019: इस अध्यादेश को मध्य प्रदेश विधानसभा से विधिवत पारित करवाकर औपचारिक कानून का रूप दे दिया गया, जिसे तुरंत ही सामान्य वर्ग के छात्रों द्वारा हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।
- अंतरिम रोक: हाई कोर्ट ने मार्च 2019 में ही मेडिकल शिक्षा और नौकरियों में इस बढ़े हुए कोटे पर अंतरिम रोक लगा दी थी, जिसके बाद सरकार ने नतीजों के लिए 87% मुख्य सूची और 13% प्राविधिक (होल्ड) सूची का फॉर्मूला निकाला था।
- 5 अगस्त 2026: मैराथन बहसों और कई सालों की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने इस पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
🗣️ गर्माई सियासत: सरकार और विपक्ष का रुख
इस फैसले के बाद मध्य प्रदेश की राजनीति पूरी तरह उबाल पर है। विपक्ष (कांग्रेस) जहां सरकार पर अदालत के सामने पिछड़ों का पक्ष और सांख्यिकीय डेटा मजबूती से न रख पाने का आरोप लगा रही है, वहीं राज्य के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह के अनुसार सरकार अब इस फैसले की कॉपियों का गहराई से विधिक अध्ययन कर रही है। कयास लगाए जा रहे हैं कि राज्य सरकार इस फैसले के खिलाफ जल्द ही देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर सकती है।