धर्म नगरी (विशेष प्रतिनिधि): आज 10 अक्टूबर 2026 को देश भर में श्रद्धा, भक्ति और अध्यात्म का एक अनूठा नजारा देखने को मिल रहा है। इस साल पितृ पक्ष का समापन एक बेहद दुर्लभ और पवित्र महासंयोग के साथ हो रहा है। आज सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के साथ-साथ शनिश्चरी अमावस्या और गजछाया योग का एक ऐसा त्रिवेणी संगम बना है, जो ज्योतिषीय दृष्टि से कई दशकों बाद आया है। इस महासंयोग के चलते सुबह से ही देश की पवित्र नदियों और तीर्थस्थलों पर स्नान, दान और तर्पण करने वाले श्रद्धालुओं का भारी तांता लगा हुआ है।
तीर्थों पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी (काशी) और गया जी जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों पर सुबह ब्रह्ममुहूर्त से ही लाखों की संख्या में श्रद्धालु पवित्र डुबकी लगा रहे हैं। गंगा, यमुना और गोदावरी के घाटों पर चारों तरफ मंत्रोच्चार और ‘स्वधा-स्वधा’ की गूंज सुनाई दे रही है। मान्यताओं के अनुसार, आज के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से न केवल कायिक कष्टों से मुक्ति मिलती है, बल्कि अक्षय पुण्य की प्राप्ति भी होती है।
क्यों खास है आज का यह महासंयोग?
- पितृ दोष और शनि दोष से एक साथ मुक्ति: ज्योतिषविदों के अनुसार, शनिवार के दिन अमावस्या तिथि पड़ने से यह शनिश्चरी अमावस्या कहलाती है। इस दिन पितरों के निमित्त श्राद्ध-तर्पण करने से पितृ दोष शांत होता है और साथ ही शनि देव की विशेष आराधना से शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या का कुप्रभाव भी दूर होता है।
- अज्ञात पूर्वजों की विदाई का दिन: आज के दिन उन सभी पितरों व पूर्वजों का तर्पण और पिंड दान किया जा रहा है, जिनकी मृत्यु की तिथि परिवार के लोगों को ज्ञात नहीं होती।
- दुर्लभ गजछाया योग: आज के दिन बन रहे गजछाया योग में श्राद्ध कर्म करने से पितर तृप्त होकर अपने वंशजों को सुख, समृद्धि और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
आज (१० अक्टूबर) के सबसे शुभ मुहूर्त
आज अमावस्या पर तर्पण और दान के लिए दोपहर का समय सबसे उत्तम माना जाता है। आज के दो मुख्य शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं:
- कुतुप मुहूर्त: दोपहर ११:४४ से दोपहर १२:३२ तक (यह समय श्राद्ध, तर्पण और पिंड दान के लिए सर्वश्रेष्ठ है)।
- रौहिण मुहूर्त: दोपहर १२:३२ से दोपहर ०१:२० तक।
- दीपदान का समय: शाम को ०५:५८ (सूर्यास्त) के बाद।
पितृ दोष और शनि दोष से मुक्ति के अचूक उपाय
चूंकि आज शनिश्चरी और सर्वपितृ अमावस्या एक साथ हैं, इसलिए ये उपाय आज ही के दिन फलदायी होंगे:
- पीपल वृक्ष की सेवा (शनि और पितृ दोनों शांत): आज शाम को किसी पीपल के पेड़ के पास जाएं। वहाँ सरसों के तेल का एक दीपक जलाएं। दीपक में थोड़े से काले तिल डाल दें। इसके बाद पीपल के पेड़ की ७ बार परिक्रमा करें और “ॐ शं शनैश्चराय नमः” और “ॐ पितृभ्यः नमः” का जाप करें।
- पंचबलि कर्म (पितरों की तृप्ति): घर में बने भोजन में से ५ हिस्से निकालकर क्रमशः गाय, कुत्ते, कौवे, देव (अग्नि) और चींटियों को खिलाएं। आज के दिन कौवे को भोजन कराना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि कौवे को पितरों का रूप माना गया है।
- काली वस्तुओं का महादान: आज किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को काले तिल, उड़द की दाल, सरसों का तेल, काले कपड़े, छाता या जूते का दान करें। इससे शनि देव तुरंत प्रसन्न होते हैं और कुंडली का शनि दोष दूर होता है।
सरल और सही तर्पण विधि (घर पर कैसे करें)
यदि आप किसी नदी घाट पर नहीं जा पाए हैं, तो घर पर ही दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यह सरल विधि अपनाएं:
- एक तांबे या पीतल के लोटे में साफ जल लें।
- उस जल में गंगाजल, कच्चा दूध, जौ, चावल और काले तिल मिला लें।
- हाथ के अंगूठे की तरफ से (जिसे पितृ तीर्थ कहते हैं) जल को किसी बड़े बर्तन में गिराते हुए अपने पूर्वजों का ध्यान करें।
- ३ बार कहें—“हे पितर देव, यह जल आपको तृप्त करे, आप हमें आशीर्वाद दें।”
शाम को पितरों की विदाई (दीपदान)
आज पितृ पक्ष का आखिरी दिन है, इसलिए शाम को पितर अपने लोक वापस लौटते हैं। उनके मार्ग में उजाला करने के लिए:
- घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा (South) की तरफ मुख करके एक दीपक (सरसों या तिल के तेल का) जरूर जलाएं। इससे पितर खुश होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर जाते हैं।
महादान का पर्व: क्या कर रहे हैं लोग?
इस महासंयोग पर मंदिरों और घाटों के किनारे दान का विशेष सिलसिला चल रहा है। श्रद्धालु अपने पितरों और शनि देव की प्रसन्नता के लिए काले तिल, काले वस्त्र, उड़द की दाल, छाता, जूते और अनाज का दिल खोलकर दान कर रहे हैं। इसके साथ ही, भूखे और जरूरतमंदों को भोजन कराना, गौ ग्रास (गाय को रोटी) देना और कौवे व कुत्तों को भोजन खिलाने (पंचबलि कर्म) की परंपरा का भी श्रद्धापूर्वक पालन किया जा रहा है।
शाम को होगा विशेष दीपदान
धार्मिक नियमों के अनुसार, आज सूर्यास्त के बाद घरों के मुख्य द्वार और दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों की विदाई के लिए विशेष दीपदान किया जाएगा। साथ ही, शनि देव को शांत करने के लिए पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने और परिक्रमा करने के लिए भी मंदिरों में विशेष तैयारियां की गई हैं।
निश्चित रूप से, आस्था और कर्म का यह संयोजन आज के दिन को आध्यात्मिक उन्नति और मानसिक शांति के लिए सर्वोत्तम बना रहा है।