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Dr. Syed Ashfaq Ali: Immortalized Bhopal’s Past

डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली:जिनकी

He was a teacher, a scholar, and a vigilant chronicler of history.

Furthermore, he preserved bhopal’s socioeconomic and cultural heritage for future generations.

शिक्षक सिर्फ वह नहीं होता जो कक्षा में खड़ा होकर पाठ पढ़ाए।

असल शिक्षक समाज को देखने की दृष्टि देता है। सवाल पूछने की आदत बनाकर ज्ञान को आगे तक पहुंचाता है।

शिक्षक दिवस पर ऐसे विद्वानों और ज्ञान-साधकों को याद करना हमारी बौद्धिक विरासत का सम्मान है।

भोपाल (bhopal) के इतिहास, समाज, शिक्षा और आर्थिक विकास को समझने में डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली उन शिक्षाविदों में थे जिन्होंने अध्यापन को सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि समाज निर्माण का माध्यम माना।

उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि शिक्षक की भूमिका कक्षा की चारदीवारी से कहीं आगे जाती है।

उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में संस्थाओं को मजबूत करने के साथ शोध और लेखन के जरिए भोपाल और मध्य प्रदेश के सामाजिक-आर्थिक इतिहास को दस्तावेजी रूप देने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

शिक्षा के क्षेत्र में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा।

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने स्व. डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली को शासकीय हमीदियाकॉलेज, भोपाल में प्रोफेसर के पद से प्रतिनियुक्ति पर सेफिया कॉलेज में नियुक्त कराया. वर्ष1960 में उन्होंने निजी सेफिया कॉलेज, भोपाल के प्राचार्य का दायित्व संभाला. लगभग 18 वर्ष 2माह तक प्राचार्य के रूप में सेवाएं देने के बाद वे वहीं से सेवानिवृत्त हुए. उनकेकार्यकाल में सेफिया कॉलेज ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार और पहचानहासिल की. डॉ. अली के नेतृत्व में कॉलेज में विभिन्न विषयों में स्नातक स्तर की कक्षाएं प्रारंभकरने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हुआ. बी.एड., एम.एससी. और एम.कॉम. जैसे पाठ्यक्रमों कोस्नातकोत्तर स्तर तक विकसित किया गया, वहीं एल.एल.बी. जैसे नए संकाय की शुरुआत भी कराईगई. उनकी सोच केवल एक संस्था के विस्तार तक सीमित नहीं थी. वे चाहते थे कि शिक्षा कालाभ समाज के अधिक से अधिक वर्गों तक पहुंचे और विद्यार्थियों को बदलती दुनिया के अनुरूपउच्च शिक्षा के अवसर मिलें. उनके नेतृत्व में सेफिया कॉलेज ने प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश केशैक्षणिक परिदृश्य में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई.

उच्च शिक्षा के लिए निरंतर प्रयास

डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली की अपनी शैक्षणिक यात्रा भी अत्यंत प्रेरणादायी रही। अपने
समय में उन्होंने देश के विभिन्न प्रमुख शिक्षा केंद्रों में जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त की।
उन्होंने इंटरमीडिएट की शिक्षा अजमेर बोर्ड, राजस्थान से प्राप्त की। इसके बाद अलीगढ़ से
बी.ए. ऑनर्स, आगरा से एम.ए. अर्थशास्त्र, कोलकाता से एम.कॉम., विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
से एम.ए. समाजशास्त्र और पीएचडी अर्थशास्त्र आगरा की उपाधि प्राप्त की।

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एक ही व्यक्ति के अर्थशास्त्र, वाणिज्य और समाजशास्त्र जैसी विधाओं में गहरी रुचि उनकी व्यापक बौद्धिक दृष्टि दर्शाती है. यही बहुआयामी दृष्टिकोण उनके शोध और लेखन में भी दिखाई देता है. वे बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, bhopal के प्रारंभिक डीन रहे. इसके अलावा रेलवे भर्ती बोर्ड के सदस्य के रूप में भी उन्होंने सेवाएं दी. उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों के साथ संवाद को महत्व दिया. शिक्षा के सामाजिक सरोकारों को भी अपने कार्य का हिस्सा बनाया. अंततः यह बहुआयामी दृष्टिकोण उनके शोध और लेखन में भी स्पष्ट दिखता है.

bhopal: इतिहास और सामाजिक जीवन

भोपाल को समझना हो तो केवल उसकी झीलों, महलों और ऐतिहासिक इमारतों को देखने से काम नहीं चलता। bhopal की असली कहानी उसके सामाजिक जीवन, आर्थिक बदलावों और सांस्कृतिक परंपराओं में छिपी है। डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली ने अपने शोध से भोपाल को इसी व्यापक दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास किया। उन्होंने इतिहास को राजाओं, नवाबों और राजनीतिक घटनाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज-आर्थिक बदलावों को भी देखा। उनकी चर्चित पुस्तक ‘Bhopal – Past and Present’ भोपाल के इतिहास और सामाजिक जीवन को समझने में अहम कृति है।

आर्थिक विकास का दस्तावेजी अध्ययन

डॉ. अशफ़ाक़ अली के शोध की व्यापकता का अंदाजा उनकी पुस्तक ‘Economic
Development of Bhopal: A Socio-Economic Survey, 1901–1973’ से लगाया जा सकता
है।
यह पुस्तक वर्ष 1974 में जय भारत पब्लिशिंग हाउस, भोपाल से प्रकाशित हुई और इसमें
700 से अधिक पृष्ठों में भोपाल के आर्थिक एवं सामाजिक विकास का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत
किया गया।
यह कार्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी शहर की आर्थिक प्रगति को केवल वर्तमान
आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। उसके पीछे की जनसंख्या, रोजगार, संस्थागत विकास,
सामाजिक संरचना और दशकों में आए आर्थिक बदलावों को समझना आवश्यक होता है।
डॉ. अली ने अपने अध्ययन में इसी व्यापक दृष्टिकोण को अपनाया। उन्होंने भोपाल को
एक जीवंत और लगातार बदलते शहर के रूप में देखने की कोशिश की।
मध्यप्रदेश की जनजातीय आबादी पर शोध

उनका शोध केवल भोपाल तक सीमित नहीं रहा। मध्य प्रदेश की जनजातीय आबादी और
उसके सामाजिक-आर्थिक विकास पर भी उन्होंने महत्वपूर्ण अध्ययन किया।

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उनकी पुस्तक ‘Tribal Demography in Madhya Pradesh: A Socio-Economic
Study, 1901–1973’ वर्ष 1973 में प्रकाशित हुई। लगभग 374 पृष्ठों की इस शोधपरक पुस्तक में
मध्य प्रदेश की जनजातीय आबादी, जनसांख्यिकीय विकास और सामाजिक परिस्थितियों का
अध्ययन किया गया है।
आज जब जनजातीय समाज, जनसंख्या और सामाजिक विकास को लेकर व्यापक
अकादमिक चर्चा होती है, तब यह तथ्य उल्लेखनीय है कि कई दशक पहले डॉ. अशफ़ाक़ अली ने
इन विषयों पर व्यवस्थित और दस्तावेजी अध्ययन प्रस्तुत किया था।
इतिहास को वर्तमान से जोड़ने का प्रयास

डॉ. अशफ़ाक़ अली की विशेषता यह थी कि उनके लिए इतिहास केवल बीते समय की
कहानी नहीं था। वे इतिहास को वर्तमान को समझने का माध्यम मानते थे।
भोपाल की बेगमों की विरासत, उसकी झीलें, उसकी तहज़ीब, साझा संस्कृति, पुराने बाजार,
शिक्षा संस्थान और सामाजिक जीवन—इन सभी को समझने के लिए केवल मौखिक स्मृतियां
पर्याप्त नहीं हैं। इनके साथ दस्तावेजी शोध और तथ्यात्मक अध्ययन भी आवश्यक हैं।
इसीलिए उनकी पुस्तकों का महत्व आज भी बना हुआ है। किसी शोधकर्ता का वास्तविक
योगदान तब सामने आता है जब उसका काम उसके समय से आगे जाकर आने वाली पीढ़ियों के
लिए उपयोगी साबित हो।

नई पीढ़ी को भोपाल के इतिहास से जोड़ना जरूरी

आज भोपाल तेजी से बदल रहा है। इसके अलावा पुराने भोपाल के साथ आधुनिक और विस्तारित भोपाल अपनी नई पहचान बना चुका है। नई सड़कें, नई कॉलोनियां, आधुनिक संस्थान और बदंली जीवनशैली शहर के विकास की कहानी कह रहे हैं। इसके साथ विकास के साथ अपनी जड़ों को जानना भी उतना ही जरूरी है। नई पीढ़ी को यह जानना चाहिए कि जिस भोपाल में वह आज है, उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक नींव कैसे बनी। किस तरह शिक्षा संस्थानों ने शहर के विकास में भूमिका निभाई? किस तरह विभिन्न समुदायों ने मिलकर भोपाल की पहचान बनाई। किस तरह आर्थिक एवं सामाजिक बदलावों ने शहर के स्वरूप को बदला। ऐसे समय में डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली जैसे विद्वानों का लेखन नई पीढ़ी के लिए एक महत्वपूर्ण सेतु बन सकता है।

शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान

एक शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं होती कि उसके कितने विद्यार्थी परीक्षा में
सफल हुए। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि उसने कितने लोगों में सोचने, सवाल करने
और सीखते रहने की इच्छा पैदा की।
डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली की विद्वतापूर्ण यात्रा को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
उन्होंने अपने विद्यार्थियों को शिक्षा दी, संस्थाओं को दिशा दी और अपनी पुस्तकों के माध्यम से

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समाज की कई पीढ़ियों को ज्ञान उपलब्ध कराया। उनका लेखन एक पीढ़ी के अनुभवों को दूसरी
पीढ़ी तक पहुंचाने वाला माध्यम बन गया।

विरासत को सुरक्षित रखना भी हमारी जिम्मेदारी

The city’s historical heritage is not limited to old buildings, palaces, or monuments.

Additionally, it also lives in books, documents, research, and memories.

Therefore, Dr. Syed Ashfaq Ali’s books and research should reach the new generation.

Universities and colleges should discuss his work, and researchers study his books.

bhopal history should engage young researchers by introducing them to these sources.

A city’s history stays alive when the next generation reads, understands, and advances it.

शिक्षक दिवस पर एक प्रेरणा

आज शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। डिजिटल माध्यम, इंटरनेट और कृत्रिम
बुद्धिमत्ता ने जानकारी तक पहुंच को बेहद आसान बना दिया है। लेकिन जानकारी और ज्ञान में
अंतर हमेशा रहेगा।
जानकारी हमें बताती है कि क्या हुआ।
शिक्षा हमें समझाती है कि ऐसा क्यों हुआ।
यही अंतर एक शिक्षक और केवल सूचना देने वाले व्यक्ति के बीच होता है।
डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली का जीवन इसी व्यापक शिक्षा का उदाहरण है। उन्होंने तथ्यों को
केवल संकलित नहीं किया, बल्कि उन्हें सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक संदर्भों में समझने का
प्रयास किया।
उनकी पुस्तकों से यह संदेश मिलता है कि इतिहास केवल अतीत को जानने के लिए नहीं
होता, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य की दिशा तय करने का आधार भी बन सकता है।

कलम से कायम रहने वाली विरासत

समय बदलता है, शहर बदलते हैं और पीढ़ियां बदल जाती हैं। लेकिन किसी विद्वान का
सच्चा कार्य समय की सीमाओं से परे चला जाता है।
डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली ने अपनी कलम के माध्यम से भोपाल के अतीत, सामाजिक
जीवन और आर्थिक विकास को दर्ज किया। उनके शोध ने उस दौर के भोपाल और मध्य प्रदेश को
समझने के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेजी आधार तैयार किया।
शिक्षक दिवस पर ऐसे विद्वान को याद करना केवल एक व्यक्ति का सम्मान करना नहीं
है, बल्कि उस ज्ञान परंपरा को नमन करना है जिसमें शिक्षक समाज को केवल पढ़ाता नहीं, बल्कि
उसे अपनी जड़ों से जोड़ता है और भविष्य के लिए तैयार करता है।

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आज जब हम अपने शिक्षकों को सम्मान देते हैं, तो उन सभी ज्ञान-साधकों को भी नमन
करना चाहिए जिन्होंने अपने जीवन को अध्ययन, अध्यापन, शोध और लेखन के लिए समर्पित
किया।
डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली उन्हीं विरल शिक्षाविदों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी कक्षा से
निकलकर अपनी कलम को समाज की पाठशाला बना दिया। उनकी पुस्तकों में दर्ज भोपाल केवल
एक शहर नहीं, बल्कि एक दौर की जीवंत स्मृति है।

नवाबी दौर की तहज़ीब का एक यादगार किस्सा

कुछ किस्से तारीख़ की किताबों में दर्ज नहीं होते, लेकिन अपने दौर की तहज़ीब, किरदार
और सामाजिक मूल्यों की खूबसूरत तस्वीर छोड़ जाते हैं। डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली के जीवन से
जुड़ा ऐसा ही एक यादगार वाकया पुराने भोपाल की अदब और तहज़ीब के साथ-साथ उनके
व्यक्तित्व के प्रभाव को भी सामने लाता है।
भोपाल की आख़िरी नवाब बेगम साजिदा सुल्तान, नवाब हमीदुल्ला खान की पुत्री और
मशहूर क्रिकेटर नवाब मंसूर अली खान पटौदी की माता थीं। डॉ. अशफ़ाक़ अली के साथ उनके
निजी संस्थान से जुड़े कार्यकाल के दौरान बेगम साहिबा उन्हें बेहद सम्मान की निगाह से देखती
थीं और महत्वपूर्ण विषयों पर अक्सर उनसे मशविरा लिया करती थीं।
एक दिन बेगम साहिबा डॉ. अशफ़ाक़ अली के साथ किसी गंभीर विषय पर बातचीत कर
रही थीं। उसी दौरान उनके युवा बेटे मंसूर अली खान पटौदी, जिन्हें प्यार से ‘टाइगर’ कहा जाता
था, पास ही क्रिकेट खेल रहे थे।
खेल के दौरान टाइगर ने एक ज़ोरदार शॉट लगाया। गेंद जाकर डॉ. अशफ़ाक़ अली को लग
गई। यह महज़ एक इत्तिफ़ाक़ था, लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह उस दौर की तहज़ीब और अदब
की एक यादगार मिसाल बन गया।
बेगम साजिदा सुल्तान ने फ़ौरन खेल रुकवाया और अपने बेटे को आवाज़ देकर कहा—
“टाइगर, इधर आओ और अशफ़ाक़ अली से माफ़ी माँगो।”
टाइगर अपनी वालिदा के पास आए और डॉ. अशफ़ाक़ अली से माफ़ी माँगी।
वाकया छोटा था, मगर अपने मायने बहुत गहरे रखता था। इसमें एक ओर डॉ. अशफ़ाक़
अली के प्रति नवाबी खानदान के सम्मान की झलक मिलती है, तो दूसरी ओर उस दौर के अदब,
विनम्रता और बड़ों के एहतराम की वह रवायत भी दिखाई देती है, जो भोपाल की तहज़ीब का
हिस्सा मानी जाती थी।
बेगम साहिबा की यह सीख केवल एक मां द्वारा अपने बेटे को दी गई सामान्य हिदायत
नहीं थी। यह उस संस्कार की मिसाल थी, जिसमें गलती छोटी हो या बड़ी, उसके लिए माफ़ी
मांगना और सामने वाले का एहतराम करना इंसान के किरदार का हिस्सा समझा जाता था।
आज पीछे मुड़कर देखें तो यह छोटा-सा किस्सा पुराने भोपाल की उस दुनिया की झलक
देता है, जहां इल्म की क़द्र थी, बुज़ुर्गों का एहतराम था और अदब को इंसान की शख्सियत का
अहम हिस्सा माना जाता था।

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डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली के जीवन से जुड़ी यादें एक व्यक्ति की कहानी नहीं हैं.

यह भोपाल की याद भी है, जिसकी पहचान इमारतों और महलों के साथ जुड़ी है.

यह याद उसकी तहज़ीब, रवायतों, रिश्तों और इंसानी क़द्रों से भी बनी थी.

शिक्षक दिवस पर डॉ. सय्यद अशफ़ाक़ अली को विनम्र नमन.

पीढ़ियां बदलती रहेंगी, भोपाल बदलेगा, लेकिन ज्ञान और इतिहास को सहेजने वाली कलम रोशनी बनती रहेगी.

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