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मारुति 800 से जुड़ाव उनकी मिडिल-क्लास मानसिकता और सादगी का प्रतीक था।

मारुति 800 से जुड़ाव उनकी मिडिल-क्लास मानसिकता और सादगी का प्रतीक था।

स्वर्गीय डॉ. मनमोहन सिंह, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्र के मनीषी, अपने सादगीपूर्ण जीवन और आदर्शवादी मूल्यों के लिए जाने जाते थे उनके जीवन के कई किस्से ऐसे हैं, जो उनकी विनम्रता और संवेदनशीलता को दर्शाते हैं। असीम अरुण, जो एसपीजी में उनके बॉडीगार्ड रह चुके हैं, ने उनकी सादगी से जुड़े कई रोचक और मार्मिक पहलुओं को साझा किया है मारुति 800 और साधारण जीवन
मनमोहन सिंह जी का अपनी  प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे करोड़ों की बीएमडब्ल्यू कारों और भव्य सुरक्षा इंतजामों के बीच अपनी पुरानी मारुति कार को देखते हुए यही कहते, “यह गाड़ी मेरी असली पहचान है।” यह उनके मिडिल-क्लास जीवन मूल्यों और साधारण जीवनशैली का प्रतीक था।घर का खाना और सादगी से भरा रूटीन
प्रधानमंत्री के रूप में अपनी व्यस्तताओं के बावजूद डॉ. सिंह का रूटीन बेहद साधारण था। वे घर का बना खाना पसंद करते थे और इसे ही अपनी ताकत मानते थे। कई बार, विदेशी दौरों पर भी, उनकी प्राथमिकता घर जैसा भोजन होती थी। वे कहते थे, पद के साथ साधारण जीवन जीने की कला नहीं छोड़नी चाहिए। बोलने से ज्यादा सुनना जरूरी है
मनमोहन सिंह जी अपनी चुप्पी और विचारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे। वे मानते थे कि सुनने की कला किसी भी नेता के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है। उनके बॉडीगार्ड्स ने यह देखा कि कैसे वे हर व्यक्ति की बात ध्यान से सुनते थे, चाहे वह एक अधिकारी हो या कोई आम नागरिक। उनके एक बॉडीगार्ड ने बताया कि उन्होंने कभी किसी से ऊंची आवाज में बात नहीं की। ईमानदारी की मिसाल
प्रधानमंत्री रहने के बावजूद, डॉ. सिंह का जीवन पूरी तरह ईमानदारी से भरा हुआ था। जब वे राज्यसभा के सदस्य थे, तो उन्होंने अपनी तनख्वाह से अधिक खर्च कभी नहीं किया। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी, उनके जीवन में दिखावा और विलासिता का नामोनिशान नहीं था। पुस्तक प्रेम और अनुशासन
मनमोहन सिंह एक विद्वान और अर्थशास्त्री थे, जिनकी दिनचर्या में पढ़ाई और लेखन का महत्वपूर्ण स्थान था। प्रधानमंत्री रहते हुए भी, वे नियमित रूप से किताबें पढ़ते थे और अपने व्यक्तिगत पुस्तकालय को व्यवस्थित रखते थे।
पद तो क्षणिक है, कर्म ही स्थायी है
एक बार, जब किसी कार्यक्रम में उनसे उनके प्रधानमंत्री पद के महत्व पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा,
“पद तो आनी-जानी चीज है, लेकिन आपके कर्म और नीयत हमेशा आपके साथ रहते हैं। मेरी कोशिश है कि मैं इस पद को ईमानदारी और जिम्मेदारी से निभाऊं।रेनकोट वाले प्रधानमंत्री
डॉ. सिंह की तुलना अक्सर उनके आलोचकों द्वारा “रेनकोट वाले प्रधानमंत्री” से की जाती थी। इसके पीछे कारण यह था कि उन्होंने बड़े-बड़े फैसले बिना किसी दिखावे या विवाद के लिए। उन्होंने चुपचाप अर्थव्यवस्था में कई सुधार किए, जिनका असर आज भी महसूस किया जाता है।
विपक्षी नेताओं के साथ मित्रवत व्यवहार
प्रधानमंत्री रहते हुए भी, उन्होंने विपक्ष के नेताओं के साथ बेहद मित्रवत और आदरपूर्ण व्यवहार किया। एक बार, जब तत्कालीन विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी अस्पताल में भर्ती थे, तो डॉ. सिंह ने निजी तौर पर जाकर उनका हालचाल पूछा।
प्रधानमंत्री कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारियों ने यह खुलासा किया कि डॉ. सिंह ने अपने प्रधानमंत्री आवास के खर्चों को भी नियंत्रित रखा। वे फिजूलखर्ची के सख्त खिलाफ थे और अपने निजी खर्चों का हिसाब खुद रखते थे।
डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल में कई बार आलोचनाएं झेली, लेकिन उन्होंने कभी किसी पर व्यक्तिगत हमला नहीं किया। जब उनसे उनकी चुप्पी पर सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा,
मैंने बोलने से ज्यादा काम करने में विश्वास रखा है। समय ही मेरा जवाब देगा।
डॉ. मनमोहन सिंह की कहानी सिखाती है कि सादगी, ईमानदारी, और कर्तव्यनिष्ठा के साथ किसी भी ऊंचाई तक पहुंचा जा सकता है। उनकी सादगी और संयम हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची महानता दिखावे में नहीं, बल्कि विचार और कर्म में होती है।
डॉ. मनमोहन सिंह न केवल एक आदर्श नेता थे, बल्कि एक ऐसे इंसान भी, जिनकी सादगी और ईमानदारी आज के नेताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

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