
जबलपुर। हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे दो व्यक्तियों को दोषमुक्त कर दिया है। अनूपपुर जिला अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए उच्च न्यायालय ने आधार सिंह और पूरन सिंह को सभी आरोपों से बरी करने के आदेश दिए। न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष यह प्रमाणित करने में पूरी तरह विफल रहा कि बृजेश सिंह की मृत्यु एक सुनियोजित हत्या थी या फिर एक साधारण सड़क दुर्घटना। पुलिस द्वारा पेश की गई साक्ष्यों की कड़ी भी अधूरी पाई गई, जिसके कारण आरोपियों को संदेह का लाभ दिया गया।
क्या है घटना का विवरण
यह पूरा विवाद साल 2013 का है जब अनूपपुर जिले में बृजेश सिंह की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। घटना वाले दिन दो बाइकों पर चार लोग सवार होकर घर वापस जा रहे थे। पहली बाइक पर आधार सिंह और पूरन सिंह थे, जबकि दूसरी बाइक पर बृजेश सिंह के साथ कैलाश नाम का व्यक्ति बैठा था। रास्ते में पान नदी के समीप खडे़ एक ट्रक से बाइक की टक्कर हो गई। इस भिड़ंत में कैलाश को चोटें आईं लेकिन बृजेश सिंह ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। पुलिस ने अंतिम बार साथ देखे जाने के सिद्धांत के आधार पर आधार सिंह और पूरन सिंह को हिरासत में लिया और उन पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया।
निचली अदालत का फैसला क्या था
अनूपपुर की जिला अदालत में चले मुकदमे के बाद 26 जून 2019 को फैसला सुनाया गया था। ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आधार सिंह और पूरन सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 201 के तहत दोषी माना था। इस फैसले के तहत दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इस सजा के विरुद्ध आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील प्रस्तुत की। 11 मई 2026 को जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की खंडपीठ ने मामले की गहन सुनवाई की। कोर्ट ने पाया कि पूरा मामला केवल परिस्थितियों पर आधारित था और कोई भी चश्मदीद गवाह मौजूद नहीं था।
मेडिकल रिपोर्ट और कानूनी तर्क
बचाव पक्ष के वकील अभिषेक पांडेय ने अदालत में दलील दी कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कोई स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था। डॉक्टरों ने भी यह स्वीकार किया था कि मृतक के शरीर पर मौजूद चोटें किसी सड़क हादसे में भी लग सकती हैं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का संदर्भ देते हुए बताया गया कि जब तक साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी न हो, तब तक किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपियों की कोई पुरानी दुश्मनी थी या उन्होंने जानबूझकर टक्कर मारी थी।
हाईकोर्ट द्वारा रिहाई के आदेश
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि घटनास्थल की स्थिति और वाहन की जांच से हत्या की बात प्रमाणित नहीं होती है। कई प्रमुख गवाहों के बयानों में विरोधाभास पाया गया और वे अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं कर सके। हाईकोर्ट ने जिला अदालत के निर्णय को त्रुटिपूर्ण मानते हुए पलट दिया। 13 साल तक जेल की सजा काटने के बाद अब आधार सिंह और पूरन सिंह जेल से बाहर आ सकेंगे। अदालत ने कहा कि कानून का सिद्धांत है कि जब तक दोष संदेह से परे साबित न हो जाए, तब तक सजा नहीं दी जा सकती।


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