
महबूबा मुफ़्ती का बयान, जिसमें उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों का जिक्र करते हुए भारत में भी अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार होने की आशंका जताई, 1 दिसंबर को राजनीति में विवाद का कारण बना। महबूबा ने कहा, “बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार हो रहे हैं, लेकिन अगर भारत में भी अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होंगे, तो फिर भारत और बांग्लादेश में क्या अंतर है? मुझे भारत और बांग्लादेश में कोई अंतर नहीं लगता।” इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा, “मुझे डर है कि हम उस दिशा में बढ़ रहे हैं, जहां 1947 के समय की स्थिति फिर से उत्पन्न हो सकती है।”
महबूबा के इस बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) भड़क गई और इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। भाजपा नेताओं ने महबूबा के बयान को देश की एकता और अखंडता के खिलाफ बताया। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि महबूबा का बयान देश के खिलाफ साजिश रचने जैसा है और यह उनके मानसिकता का प्रदर्शन है, जो हमेशा पाकिस्तान और अन्य देशों के साथ तुलना करती हैं। उन्होंने महबूबा से सवाल किया कि वे जब बांग्लादेश की तुलना भारत से करती हैं, तो क्या उन्हें अपनी पार्टी के रुख और बयानबाजी पर पुनर्विचार करना चाहिए।
BJP ने आरोप लगाया कि महबूबा हमेशा देश के सांप्रदायिक माहौल को बिगाड़ने की कोशिश करती हैं और उनके बयान से यह साफ जाहिर होता है कि वे कभी भी देश की सुरक्षा और एकता के पक्ष में नहीं रही हैं। भाजपा ने यह भी कहा कि महबूबा का बयान पाकिस्तान समर्थक रुख को दर्शाता है, और इस तरह के बयानों से देश के अंदर विश्वास और सामूहिकता को कमजोर किया जा सकता है।
महबूबा के बयान को लेकर जम्मू-कश्मीर में भी राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। जहां एक ओर महबूबा ने यह बयान दिया था, वहीं दूसरी ओर उनके समर्थकों ने इसे ‘सच्चाई’ के रूप में प्रस्तुत किया और कहा कि वे हमेशा नागरिक अधिकारों की रक्षा के पक्ष में रही हैं। वहीं, विरोधियों ने महबूबा पर आरोप लगाया कि वह हमेशा भारत के भीतर बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसी स्थितियों की तुलना करती हैं, जिससे सांप्रदायिक माहौल खराब होता है।
महबूबा ने अपने बयान का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने केवल यह महसूस किया कि आज भी भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्पीड़न और हिंसा की घटनाएं हो रही हैं, और उनका यह बयान किसी विशेष समुदाय के खिलाफ नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की रक्षा की दिशा में था।



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