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बुद्धि है हर इंसान में, लेकिन जातिवाद की दीवार खड़ी है

बुद्धि है हर इंसान में, लेकिन जातिवाद की दीवार खड़ी है



कैलाश पाण्डेय


कक्का की चौपाल पर आज फिर एक दिलचस्प और वर्तमान यूजीसी मुद्दे पर चर्चा हो रही थी। पूरे गांव के लोग इकठ्ठा हुए थे, और कक्का की चौपाल हमेशा की तरह समाज के बड़े मुद्दों पर विचार मंथन का स्थान बन चुकी थी। कक्का चाय का प्याला हाथ में लेकर सोच में डूबे हुए थे, और चौरंगी लाल भी अपनी चाय की चुस्की लेते हुए गहरी सोच में थे। दोनों के बीच “बुद्धि”, “जाति” और “सरकार की भूमिका” पर विचार हो रहे थे, और अब सवाल यह उठ रहा था कि क्यों जिम्मेदार पदों पर आसीन कुछ लोग आरक्षित जातियों के बारे में यह मानते हैं कि उनके बुद्धि विकास की आवश्यकता है?
कक्का चाय का प्याला रखते हुए कहते हैं, “देखो, हर इंसान को बुद्धि प्रचुर मात्रा में मिली है, यह किसी से छिपा नहीं है। कोई भी इंसान यह नहीं मानता कि उसके पास बुद्धि की कमी है। लेकिन जब हम जातियों की बात करते हैं, तो समाज में एक मानसिक ढांचा बना हुआ है, जिसमें कुछ जातियाँ कमतर मानी जाती हैं। अब, सवाल यह है कि जब सरकारें और नीति निर्धारक इसे मानती हैं, तो क्यों उन्हें लगता है कि आरक्षित जातियों में बुद्धि विकास की ज़रूरत है?”
चौरंगी लाल गहरी सोच में डूबे हुए कहते हैं, “कक्का, यही सवाल तो महत्वपूर्ण है। ज़रा सोचिए, जो लोग सत्ता और जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं, वे क्यों यह मानते हैं कि कुछ जातियों को अपनी बुद्धि का सही उपयोग करने के लिए विशेष अवसर या सहायता की जरूरत है? क्या यह वास्तव में बुद्धि की कमी है, या फिर यह एक पुराना मानसिक ढांचा है, जो इन जातियों के बारे में समाज ने बना लिया है?”
कक्का मुस्कराते हुए कहते हैं, “यह एक बड़ा सवाल है। दरअसल, बुद्धि तो हर इंसान में प्रचुर मात्रा में होती है। लेकिन जब हम किसी जाति के बारे में यह कहते हैं कि उसका बुद्धि विकास करना है, तो इसका मतलब क्या है? क्या यह इसलिए है कि उन जातियों को समाज ने हमेशा निचला दर्जा दिया, और उन्हें सही अवसर नहीं मिल पाए?”
चौरंगी लाल फिर अपनी बात रखते हुए कहते हैं, “समाज में जो मानसिकता है, उसे बदलने की आवश्यकता है। जब हम आरक्षित जातियों की बात करते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि उनके पास बुद्धि की कमी है। बल्कि यह है कि उन्हें इतिहास, समाज, और संसाधनों के नाम पर कभी सही मौके नहीं मिले। जब सरकारें और नीति निर्धारक यह कहते हैं कि आरक्षित जातियों में बुद्धि विकास की आवश्यकता है, तो वह इसे एक समर्थन के रूप में प्रस्तुत करते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि यह उनकी सामाजिक और ऐतिहासिक स्थिति है, जो उनकी सोच और समझ को प्रभावित करती है।”
कक्का अब गंभीर होते हुए कहते हैं, “तुमने ठीक कहा, चौरंगी लाल। सरकारें यह क्यों मानती हैं कि आरक्षित जातियों में बुद्धि विकास की आवश्यकता है, इसका सीधा संबंध हमारी सामाजिक संरचना से है। सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी जाति के बुद्धि का विकास अवसर से होता है। अगर किसी जाति को समाज में हमेशा निचला दर्जा दिया गया हो, तो वह अपनी बुद्धि का सही उपयोग नहीं कर पाती। इसका मतलब यह नहीं कि उनकी बुद्धि कम है, बल्कि यह कि उन्हें वह अवसर नहीं मिले, जिनसे उनकी बुद्धि का विकास हो सकता था।”
चौरंगी लाल ने सिर झुका लिया और बोले, “कक्का, बात यहाँ पर यह है कि सरकार और नीति निर्धारक अक्सर इस विचारधारा से बंधे होते हैं कि आरक्षित जातियाँ उन क्षेत्रों में पिछड़ी हैं, जहां अन्य जातियाँ आगे बढ़ चुकी हैं। लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि आरक्षित जातियाँ बुद्धिहीन नहीं हैं। यह उनका सामाजिक संदर्भ और इतिहास है जो उनके लिए अवसरों को सीमित करता है।”
कक्का ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “यह सही है। अगर हम बुद्धि और जाति की तुलना करें, तो यह साफ है कि बुद्धि हर इंसान में प्रचुर मात्रा में होती है। किसी भी जाति को कमतर मानना, केवल एक सामाजिक पूर्वाग्रह का परिणाम है। जब तक सरकारें और नीति निर्धारक समान अवसरों की बात नहीं करेंगे, तब तक हम समाज में कोई ठोस बदलाव नहीं ला सकते।”
चौरंगी लाल सिर हिलाते हुए कहते हैं, “इसीलिए, कक्का, जो लोग सत्ता और जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि आरक्षित जातियाँ अवसरों की कमी के कारण अपनी बुद्धि का पूरा उपयोग नहीं कर पा रही हैं। यह सामाजिक असमानता और जातिवाद का नतीजा है, न कि बुद्धि की कमी का। यदि हम वास्तव में बुद्धि के विकास की बात कर रहे हैं, तो हमें समान अवसरों की बात करनी होगी।”
कक्का अब गंभीर होते हुए कहते हैं, “हां, यही असल मुद्दा है। जातिवाद और सामाजिक पूर्वाग्रह को दूर करने के लिए हमें समान अवसरों का वितरण करना होगा। यह जरूरी है कि सरकारें और नीति निर्धारक समझें कि किसी भी जाति में बुद्धि की कोई कमी नहीं होती। वह अपनी बुद्धि का सही उपयोग तभी कर सकते हैं, जब उन्हें सही अवसर मिलेंगे।”
चौरंगी लाल ने फिर अपनी चाय का प्याला रखते हुए कहा, “अगर सरकारों को यह समझ में आ जाए कि बुद्धि हर इंसान में है और हमें उसे समान रूप से विकसित करने के लिए समान अवसर देने होंगे, तो शायद हम जातिवाद और असमानता को समाप्त कर सकते हैं। आरक्षित जातियाँ अपनी बुद्धि का पूरी तरह से उपयोग कर सकती हैं, बस उन्हें अवसरों की जरूरत है।”
कक्का ने मुस्कराते हुए कहा, “बिलकुल, चौरंगी लाल। यह समझने की जरूरत है कि बुद्धि का विकास अवसरों पर निर्भर करता है। अगर हम जातिवाद और सामाजिक असमानता को खत्म करते हैं, तो हर जाति को अपनी बुद्धि का सही उपयोग करने का मौका मिलेगा। तभी हम समाज में असली बदलाव ला पाएंगे।”
इसी बीच घसीटा बोल पड़ा और चौपाल को संबोधित करते हुए कहा बुद्धि और जाति के बीच कोई वास्तविक संबंध नहीं है। सरकारों और नीति निर्धारकों को यह समझना होगा कि आरक्षित जातियाँ अपनी बुद्धि का सही उपयोग केवल समान अवसरों के द्वारा कर सकती हैं, न कि केवल आरक्षण या विशेष सहायता से।

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