
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केरल हाई कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को उसके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) के आधार पर सरकारी नौकरी देने से इनकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति को अदालत दोषी नहीं ठहराती, तब तक वह निर्दोष माना जाएगा। यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों को सुदृढ़ करता है।
यह मामला एक उम्मीदवार से जुड़ा था, जिसे सरकारी नौकरी में चयनित होने के बाद केवल उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर के आधार पर अयोग्य ठहरा दिया गया था।
उम्मीदवार ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को सिर्फ दर्ज एफआईआर के कारण सेवा से वंचित करना अन्यायपूर्ण है, और इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया।
निर्दोषता की अवधारणा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान और कानून के तहत प्रत्येक व्यक्ति तब तक निर्दोष है, जब तक कि उसे अदालत दोषी न ठहराए।
सरकारी नीति और न्याय का संतुलन
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी उम्मीदवार के चरित्र की जांच करते समय केवल एफआईआर दर्ज होना पर्याप्त नहीं है। नीतियों को न्यायिक संतुलन बनाए रखना चाहिए।
नैतिकता और रोजगार का अधिकार
अदालत ने कहा कि रोजगार के अवसरों से किसी व्यक्ति को केवल आधारहीन आरोपों के कारण वंचित करना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
यह निर्णय उन हजारों उम्मीदवारों के लिए राहत है, जो मात्र प्राथमिकी के कारण रोजगार के अवसर खो देते हैं। यह न्यायालय का फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) की रक्षा करता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून की सर्वोच्चता, और न्यायिक विवेक के महत्व को रेखांकित करता है। यह फैसला न केवल न्याय का संदेश देता है, बल्कि प्रशासनिक नीतियों को भी अधिक संवेदनशील और न्यायपूर्ण बनाता है।



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