
जबलपुर । हाई कोर्ट ने रेलवे के एक बुकिंग क्लर्क की बर्खास्तगी को अवैध ठहराते हुए 25 साल पुराने मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। मामला सिर्फ 10 रुपये के लेनदेन में गड़बड़ी के आरोप से जुड़ा था, जिसके कारण एक कर्मचारी को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी थी। हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने रेलवे की अपील को खारिज करते हुए कर्मचारी की सेवा बहाली का रास्ता साफ कर दिया है। अदालत ने रेलवे के विजिलेंस विभाग की पूरी कार्यवाही को नियमों के खिलाफ और दोषपूर्ण माना है।
- विजिलेंस की छापेमारी से शुरु हुआ घटनाक्रम
पूरे मामले की शुरुआत 4 जनवरी 2002 को हुई थी, जब बुकिंग क्लर्क नारायण नायर की ड्यूटी श्रीधाम रेलवे स्टेशन के टिकट काउंटर पर लगी थी। इसी दौरान विजिलेंस की टीम ने औचक निरीक्षण किया। टीम के सामने एक यात्री आया जिसने आरोप लगाया कि उसे टिकट के बदले 31 रुपये वापस मिलने थे, लेकिन नारायण नायर ने उसे केवल 21 रुपये ही लौटाए। विजिलेंस टीम ने जब काउंटर की जांच की तो वहां कर्मचारी के पास 450 रुपये अतिरिक्त पाए गए। नारायण नायर ने सफाई देते हुए कहा था कि ये पैसे उनकी पत्नी की दवा के लिए थे और भीड़ अधिक होने के कारण हिसाब में कोई मानवीय भूल हो सकती है। हालांकि, जांच टीम ने उनकी दलीलों को अनसुना कर दिया।
-निलंबन से बर्खास्तगी तक की कानूनी लड़ाई
विजिलेंस टीम की रिपोर्ट के आधार पर नारायण नायर के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई। जांच के दौरान उन्हें प्रथम दृष्टया दोषी पाया गया और पहले निलंबित कर दिया गया। इसके बाद 15 मार्च 2002 को रेलवे प्रशासन ने उन्हें सेवा से बर्खास्त करने का कड़ा फैसला लिया। नारायण नायर ने इस कार्रवाई के विरोध में सहायक मंडल रेलवे प्रबंधक के समक्ष अपील की, लेकिन वहां से उन्हें कोई राहत नहीं मिली। हार मानकर उन्होंने वर्ष 2002 में ही केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) में न्याय की गुहार लगाई। कैट ने मामले की सुनवाई करते हुए 16 जुलाई 2004 को नारायण नायर के पक्ष में फैसला सुनाया और बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त कर दिया।
हाई कोर्ट ने विजिलेंस की जांच में पाईं गंभीर खामियां
कैट के आदेश को रेलवे ने वर्ष 2005 में जबलपुर हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। करीब 21 साल तक हाई कोर्ट में चली इस कानूनी लड़ाई का फैसला अप्रैल 2026 में आया। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान पाया कि विजिलेंस की जांच प्रक्रिया में गंभीर कानूनी खामियां थीं। अदालत ने अपनी सख्त टिप्पणी में कहा कि जांच अधिकारी ने ही अभियोजन की भूमिका निभाई, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका नहीं दिया गया, जिससे पूरी कार्यवाही अवैध हो गई।
-रेलवे के सारे तर्क सिरे से खारिज
हाई कोर्ट ने कैट के पुराने फैसले को सही ठहराते हुए रेलवे की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद नारायण नायर की नौकरी में बहाली का मार्ग प्रशस्त हो गया है। अदालत के इस रुख से कर्मचारी को पिछले 25 वर्षों के बकाया वेतन और अन्य सेवा लाभ मिलने की उम्मीद जाग गई है। नारायण नायर की ओर से अधिवक्ता आकाश चौधरी ने पैरवी की थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि छोटे आरोपों में भी न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है और बिना निष्पक्ष सुनवाई के किसी कर्मचारी को बर्खास्त करना मौलिक अधिकारों का हनन है।


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