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“जिसका कोई नहीं होता, उसकी पुलिस है यारों”  अनूपपुर पुलिस ने पेश की मानवता की मिसाल

“जिसका कोई नहीं होता, उसकी पुलिस है यारों”  अनूपपुर पुलिस ने पेश की मानवता की मिसाल





जब समाज किसी को भुला देता है, जब अपनों की पहचान भी धुंधली हो जाती है, तब एक उम्मीद होती है — पुलिस की वर्दी में छुपी इंसानियत। अनूपपुर जिले की कोतवाली पुलिस ने यही कर दिखाया — एक मानसिक रूप से अस्वस्थ युवक को सहारा देकर, उसे उसके परिजनों तक सकुशल पहुँचाकर न सिर्फ कानून की, बल्कि करुणा की भी जीत दर्ज की है।

ग्राम बेला की शांत गलियों में एक उदास, थका हुआ चेहरा… धूल से सनी धोती-कुर्ता पहने एक व्यक्ति, जिसकी आँखों में खोई हुई पहचान का डर है। बच्चे उसे दूर से देख रहे हैं, महिलाएँ आपस में बातें कर रही हैं — “कौन है ये? कहाँ से आया?”। तभी सूचना मिलती है — और पुलिस की जीप धूल उड़ाती हुई गाँव में दाखिल होती है।

टी.आई. अरविंद जैन के नेतृत्व में सहायक उपनिरीक्षक जागेश्वर प्रसाद और आरक्षक प्रवीण कुमार उतरते हैं। कोई हथियार नहीं निकाला जाता, बल्कि एक गिलास पानी, एक मुस्कान और एक इंसानी रवैया उसके करीब ले जाया जाता है। धीरे-धीरे उसे जीप में बैठाया जाता है, जैसे कोई अपने घर वापसी के सफर पर निकला हो।


दिनांक 15 जून 2025 को अनूपपुर कोतवाली अंतर्गत ग्राम बेला की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती सम्पतिया राठौर द्वारा सूचना दी गई कि एक अजनबी व्यक्ति गाँव में घूम रहा है, जो मानसिक रूप से अस्वस्थ प्रतीत हो रहा है। सूचना मिलते ही पुलिस अधीक्षक श्री मोती-उर-रहमान के निर्देशन में थाना प्रभारी अरविंद जैन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए टीम भेजी।

सहायक उपनिरीक्षक जागेश्वर प्रसाद एवं आरक्षक प्रवीण कुमार मौके पर पहुंचे और अत्यंत संयम व सहानुभूति के साथ उस व्यक्ति को सुरक्षित थाने लाया गया। पूछताछ और सोशल मीडिया पर सर्च के आधार पर उसकी पहचान मनोज सिंह पिता केसरी सिंह, उम्र 38 वर्ष, निवासी कररुआ, जिला सतना के रूप में हुई।

कोतवाली परिसर में एक मेहमान की तरह, तीन दिन तक उसे भोजन, वस्त्र और शरण दी गई। यह पुलिस स्टेशन नहीं, मानो एक अस्थायी घर बन गया। इस दौरान सतत प्रयास से उसकी पत्नी संगीता सिंह और ससुर विष्णु प्रताप सिंह से संपर्क किया गया। जब वे थाने पहुँचे और वर्षों बाद बेटे-पति को जीवित सामने पाया — उस क्षण की भावनाओं को शब्दों में पिरोना कठिन है।

💬 परिजनों की प्रतिक्रिया

“हमें उम्मीद नहीं थी कि वो कभी लौटेगा… लेकिन आपने सिर्फ पुलिस नहीं, परिवार की तरह खोज कर हमें लौटा दिया। हम आजीवन कृतज्ञ हैं।” – यह कहना था मनोज की पत्नी संगीता का, जिनकी आँखों से अश्रुधारा थमने का नाम नहीं ले रही थी।

इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि पुलिस सिर्फ अपराधियों की नहीं, बेसहारा और कमजोरों की भी प्रहरी है। कोतवाली अनूपपुर पुलिस ने जिस संवेदनशीलता, समर्पण और मानवीय मूल्यों का परिचय दिया है, वह वर्दी के पीछे छुपे एक भावुक और सजग नागरिक के चेहरे को उजागर करता है।

“जहाँ सबने मुँह मोड़ा, वहाँ पुलिस ने गले लगाया — यही है ‘जनसेवा’ ।”

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Kailash Pandey
Anuppur
(M.P.)

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