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सोन नदी में रेत खनन बना संकट प्रशासनिक चुप्पी, घटता जलस्तर और सूखते बोरवेल – मशीरा गांव की पुकार कौन सुनेगा?

सोन नदी में रेत खनन बना संकट प्रशासनिक चुप्पी, घटता जलस्तर और सूखते बोरवेल – मशीरा गांव की पुकार कौन सुनेगा?


जयसिंहनगर, शहडोल

शहडोल जिले की पावन सोन नदी आज विकास के नाम पर बेहाल है। जयसिंहनगर ब्लॉक की ग्राम पंचायत मशीरा में सहकार ग्लोबल कंपनी द्वारा रेत खनन ने पूरे गांव की जल व्यवस्था को संकट में डाल दिया है। जहां एक ओर सरकार जल संरक्षण और नदी बचाओ अभियान का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी ओर खनन माफिया को खुली छूट दी जा रही है।
रेत खनन के नियम और प्रक्रियाएँ
भारत सरकार के खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, और जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत निम्नलिखित मानक निर्धारित हैं
खनन पट्टा राज्य सरकार की अनुमति से ही खनन संभव है।
पर्यावरणीय मंजूरी (EIA) परियोजना शुरू होने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन अनिवार्य है।
स्थानीय सहमति ग्राम सभा और प्रभावित समुदायों की सहमति आवश्यक है।
रेत खनन का समय और क्षेत्र मानसून में खनन प्रतिबंधित होता है। नदियों के भीतर अधिक गहराई में खुदाई नहीं होनी चाहिए।
मशीरा में उपरोक्त में से कोई नियम पूरी तरह लागू नहीं हो रहा। ट्रकों से रोज़ सैकड़ों टन रेत निकाली जाती है और हजारों लीटर पानी व्यर्थ बहाया जाता है।
प्रशासनिक निष्क्रियता और संभावित कारण राजनीतिक दबाव
खनन कंपनियों का स्थानीय राजनीतिक ताकतों से गहरा संबंध है। वोट बैंक और चंदे के लालच में जिम्मेदार आंख मूंदे  है।
जमीनी स्तर से लेकर उच्च पदस्थ अधिकारियों तक रिश्वत की श्रृंखला जुड़ी होना का ग्रामीणों ने आरोप लगाया है। अवैध खनन की आंखें बंद करके मंजूरी दी जाती है। निगरानी की कमी
खनन क्षेत्र में CCTV, GPS आधारित मॉनिटरिंग और सैटेलाइट इमेजिंग जैसी व्यवस्थाएं या तो कागज़ों में हैं या बंद पड़ी हैं।
पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव जल स्तर में गिरावट
रेत, नदी का प्राकृतिक जल-छानक होता है। जब रेत हटा दी जाती है, तो भूजल पुनर्भरण (recharge) की प्रक्रिया ठप हो जाती है। मशीरा में कई हैंडपंप और बोरवेल सूख चुके हैं।
जैव विविधता पर प्रभाव
सोन नदी की तलहटी में रहने वाले जलीय जीवों का जीवन संकट में है। अंडों के लिए उपयुक्त रेत का नाश हो गया है।
स्थानीय समुदायों पर प्रभाव पीने का पानी संकट में है।
खेती पर असर पड़ा है।जलजनित रोग बढ़े हैं।
महिला और बच्चों पर पानी लाने का बोझ बढ़ गया है।
जनहित याचिका (PIL)
उच्च न्यायालय या राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) में याचिका दाखिल कर पर्यावरणीय न्याय की मांग की जा सकती है।
राज्य खनिज निगम और पर्यावरण मंत्रालय को तुरंत संज्ञान लेकर
खनन की सीमा तय करनी चाहिए।
अवैध परिवहन करने वाले वाहनों को जब्त करना चाहिए।
कंपनी पर आर्थिक दंड लगाना चाहिए। क्या केवल रेत निकाली जा रही या भविष्य छीना जा रहा?
मशीरा गांव की पीड़ा कोई एक गांव की नहीं, यह देश के कई हिस्सों की सच्चाई है। हर साल अरबों की रेत निकलती है लेकिन ग्रामीणों को एक बूंद पीने का साफ पानी भी नसीब नहीं होता। जलवायु परिवर्तन के दौर में जल स्रोतों का संरक्षण यदि सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं बना, तो अगली पीढ़ी रेत में पानी नहीं, केवल इतिहास खोजेगी।
रेत से भविष्य बनाने का सपना दिखाने वाले, आज उसी रेत से गांवों का भविष्य निगल रहे हैं। यह समय है जब पर्यावरण, समाज और व्यवस्था एकजुट होकर खनन माफिया को रोके और सोन नदी को पुनः जीवन दे।

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Kailash Pandey
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(M.P.)

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