आजादी के बाद से हमारी सरकारें बदलती रहती हैं आती हैं और चली जाती हैं, लेकिन एक चीज़ जो कभी नहीं बदली, वह है भ्रष्टाचार। यह एक ऐसी बीमारी है, जो समाज के हर कोने में अपनी जड़ें फैला चुकी है। सरकारी योजनाएं हमेशा आम आदमी की भलाई के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन जिनके हाथ में इन योजनाओं को लागू करने की जिम्मेदारी है, वे ही इनका गला घोंट देते हैं। यही हाल शहडोल जिले के ग्राम पंचायत छूदा के रोजगार सहायक चंद्र प्रकाश गुप्ता का हुआ है। जिन्होंने एक गरीब परिवार के सदस्य से न केवल उसकी उम्मीदें छीनीं, बल्कि दुख के समय में एक और आघात देते हुए रिश्वत की मांग की। क्या यह भ्रष्टाचार का वह रूप नहीं है, जो हमारे समाज और व्यवस्था के मुखौटे को और भी बुरी तरह ध्वस्त कर रहा है?
चंद्र प्रकाश गुप्ता का कृत्य साफ-साफ बताता है कि अगर किसी सरकारी योजना का असली फायदा किसी को हो सकता है तो वह है रिश्वत लेने वाले अधिकारी। जनता तो कभी खुद को उसके अधिकार से लैस नहीं पाती, लेकिन अधिकारियों को हर कदम पर अपनी जेबें भरने का मौका मिल जाता है।
आप सोचिए, एक आदमी जिसने हाल ही में अपने पिता को खो दिया हो, उसके पास क्या उम्मीदें बची होंगी? क्या उस समय सरकारी योजनाओं का काम केवल उसके परिवार को सहारा देने के लिए नहीं होना चाहिए था? लेकिन अफसोस, सरकार की योजनाएं कहीं और ही काम करती हैं—किसी की मदद के बजाय। रोजगार सहायक ने उस युवक की मां के खाते में राशि ट्रांसफर करने के बदले 33,500 रुपये की रिश्वत मांगी। अब यह रिश्वत तो अब आपके-हमारे घरों तक कभी नहीं पहुंच सकती, क्योंकि इसमें खून-पसीने की मेहनत नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की महक है। क्या यही है वह ‘संबल’ जो योजना का हिस्सा बनता है?
इस कृत्य को देखकर समझ आता है कि आज हमारे पास जो सरकारी योजनाएं हैं, उनका असल उद्देश्य गरीबों तक मदद पहुंचाना नहीं, बल्कि उन योजनाओं को निजी स्वार्थ के लिए हथियाना है। क्या यही है वह ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’, जो गरीबों को मकान देने के लिए बनाई गई थी? और जो ‘संबल योजना’ सरकार के लिए एक राहत थी, वह भी चंद्र प्रकाश जैसे लोगों के लिए केवल और केवल एक कमाई का जरिया बन गई। इस भ्रष्टाचार का जाल पूरे सिस्टम में घुस चुका है, जहां हर रिश्वत की डील पर अधिकारियों की जेबें तो भरती हैं, लेकिन गरीबों की झोलियाँ हमेशा खाली रहती हैं।
अगर यही तरीका है संबल योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ देने का, तो शायद हमें इन योजनाओं की असलियत पर ही सवाल उठाने की जरूरत है। जिन अधिकारियों को यह जिम्मेदारी दी गई है, क्या वे वाकई में जनता के भले के लिए काम कर रहे हैं? या फिर ये योजनाएं उनके लिए सिर्फ एक और कमाई का धंधा बन चुकी हैं? आखिरकार, यह सवाल उठता है कि हम कितनी बार भ्रष्टाचार के खेलों को देखकर खामोश रहेंगे? राजनेताओं के वादों का क्या होगा जब आम आदमी की उम्मीदें भ्रष्टाचार के तले दब जाएंगी? क्या हम अब भी इन कागजों के खेलों पर विश्वास करेंगे या फिर सिस्टम में सुधार की सख्त जरूरत महसूस करेंगे? सरकारी योजनाओं का असल मतलब क्या है—गरीबों का मक्सद पूरा करना या उन्हें और भी गरीब बना देना!




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