भूख और प्यास घर के अंदर का सन्नाटा

भोपाल के गोया कॉलोनी में 80 वर्षीय वृद्धा ललिता दुबे की भूख-प्यास और देखभाल के अभाव में मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज की संवेदनहीनता और गिरते मानवीय मूल्यों की गहरी झलक है। यह घटना एक सच है उस आधुनिक जीवनशैली पर, जहां ‘परिवार’ महज एक शब्द बनकर रह गया
गोया कॉलोनी की तंग गलियों में ललिता देवी का घर खड़ा था, जो कभी खुशियों से गूंजता था। घर की दीवारों पर अब भी पुरानी यादों के निशान थे—तस्वीरों में हंसते चेहरे, छत पर बैठकर चाय पीते बेटे, और बच्चों की किलकारियां। लेकिन वक्त ने उस घर को सिर्फ ईंट और गारे का ढांचा बना दिया।
19 अक्टूबर की वह सुबह, जब पड़ोसी रामदीन चाय पीते हुए सोच रहे थे कि ललिता जी बाहर क्यों नहीं आईं, तभी घर से तेज दुर्गंध ने उनकी चाय का स्वाद कड़वा कर दिया।
रामदीन और अन्य पड़ोसियों ने पुलिस को बुलाया। ताला तोड़ने पर जो दृश्य सामने आया, उसने सभी को झकझोर दिया। ललिता देवी का निर्जीव शरीर बिस्तर पर पड़ा था। उनके चेहरे पर भूख और प्यास की लकीरें इतनी गहरी थीं कि मानो वो अपने बेटे और बहुओं से सवाल पूछ रही हों:
“क्या मेरा होना इतना बोझिल था?”
पड़ोसियों ने रोते हुए कहा, “अम्मा को हमने कई बार मदद का हाथ बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन उनके बेटे… क्या कहें, वह तो खुद लाचार निकले।”
बेटे, बहुएं और जिम्मेदारी का व्यापार
बड़ा बेटा अजयसंवेदनशीलता का खंडहर
अजय, इंदौर में पुलिस सब-इंस्पेक्टर है। कानून का रखवाला, लेकिन अपनी मां के लिए दिल का दरवाजा बंद किए बैठा था। अजय की व्यस्तता ने उसे अपने कर्तव्यों से इतना दूर कर दिया कि उसने मां की सुध तक नहीं ली।
छोटा बेटा अरुण कर्तव्यहीनता का चेहरा
अरुण, अपनी पत्नी और बच्चे के साथ उज्जैन चला गया। जाने से पहले उसने घर को ताले में बंद कर दिया, जैसे रिश्तों की आखिरी सांस को भी कैद कर दिया हो। उसने यह सोचा ही नहीं कि उसकी मां के लिए ताला उनकी मौत का गवाह बन जाएगा।
बहुएं रिश्तों की स्वार्थी तस्वीर
बड़ी बहू इंदौर में थी, और छोटी बहू उज्जैन में। दोनों ने सास को अपने जीवन से निकाल बाहर कर दिया, जैसे वे कोई पुराना सामान हों
ललिता देवी की मौत ने समाज के सामने एक कड़वा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या आज के दौर में माता-पिता केवल एक जिम्मेदारी हैं?
माता-पिता बोझ या जीवन का आधार?
कभी माता-पिता को जीवन का आधार माना जाता था। लेकिन आधुनिक समाज में, उन्हें बोझ समझा जाने लगा है
आजकल बहुएं और बेटे ‘स्वतंत्रता’ और ‘व्यक्तिगत जीवन’ के नाम पर परिवार से दूरी बना लेते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि माता-पिता ने अपने सपनों का बलिदान देकर उन्हें बड़ा किया है।
यह घटना उस समाज की है, जहां लोग अपने कुत्ते और बिल्लियों के लिए महंगे फूड और टॉयज खरीदते हैं, लेकिन अपने माता-पिता के लिए समय और देखभाल नहीं कर पाते।
हमें यह लिखने में गुरेज नहीं है इस घटना पर लिखना
“एक मां, अपने बच्चों को भूख से बचाने के लिए कभी अपना हिस्सा त्यागा था, आज उन्हीं बच्चों की संवेदनहीनता के कारण भूख से मर गई।
“अपनी जिंदगी जीने दो” का दंभ
आधुनिकता की दौड़ में परिवार के बुनियादी मूल्यों को कुचला जा रहा है। ‘मैं और मेरा’ की मानसिकता ने ‘हम और हमारा’ को खत्म कर दिया है।
कानून और नैतिकता का अभाव
भारत में माता-पिता भरण-पोषण कानून है, लेकिन इसका पालन तभी होता है जब किसी की मौत हो जाए।
समाज के लिए सबक संवेदनशीलता की ओर लौटें माता-पिता की देखभाल का संकल्प
हर बेटे और बहू को यह समझना चाहिए कि माता-पिता का सम्मान और देखभाल करना उनका नैतिक कर्तव्य है
सरकार और सामाजिक संस्थाओं को इस मुद्दे पर जागरूकता फैलानी चाहिए।
जो लोग माता-पिता की अनदेखी करते हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।



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