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जिंदा को इलाज नहीं, मुर्दे को ठिकाना नहीं संवेदनहीनता की ठंडी रात

जिंदा को इलाज नहीं, मुर्दे को ठिकाना नहीं संवेदनहीनता की ठंडी रात



रक्तहीन व्यवस्था और संवेदनहीनता का राजपथ”

हमारे देश में सरकारी व्यवस्थाओं की  झलक जबलपुर मेडिकल कॉलेज की इस घटना ने  मानो उस प्रणाली का नंगा नाच है, जो कागज़ पर ‘आदर्श’ है लेकिन ज़मीन पर ‘अवशेष’। रक्त न मिलने से मरने वाले व्यक्ति की मौत के बाद मेडिकल स्टाफ का शव को बाहर फेंक देना और बेटे को सड़क पर बैठने देना, इस बात का प्रमाण है कि मानवता की नसें इस व्यवस्था में सूख चुकी हैं।
स्वास्थ्य सेवा या संवेदनहीनता का संस्थान?
मेडिकल कॉलेज, जो कि मरीजों के लिए एक आसरा होना चाहिए, अब मृत्यु का ठिकाना बन चुका है। डॉक्टर और स्टाफ का कहना कि उन्हें कुछ पता नहीं, यह बयान इतना सामान्य हो चुका है कि अब इसे सरकारी भाषा में “हमारी जिम्मेदारी नहीं है” के समानार्थी शब्दकोश में शामिल किया जा सकता है। रक्त की कमी का रोना रोने वाले ये अस्पताल यह भूल जाते हैं कि उनके पास अपनी संवेदनाओं को पुनर्जीवित करने के लिए ही रक्त की ज़रूरत है।
खून लाओ” – मानो किराने की दुकान से सामान लाने की बात हो!
16 साल का नारायण, जिसका कंधा अभी खुद का बोझ उठाने लायक भी नहीं हुआ, उससे कहा गया कि “खून का इंतजाम करो।” डॉक्टर का यह निर्देश मानो एक पिता की मौत का परवाना था। क्योंकि इस व्यवस्था में गरीब की दुआ और डॉक्टर की मांग, दोनों असंभव हैं। क्या 16 साल का वह लड़का अपनी जेब में खून लेकर घूमने वाला कोई सुपरहीरो था? या फिर उसे किसी देवता से दान मांगने भेजा गया था?
“शव बाहर रख दिया” – इंसान नहीं, सामान समझा गया।
मृतक के शव को मेडिकल कॉलेज के बाहर रख देना यह दर्शाता है कि गरीब का जीवन ही नहीं, उसकी मृत्यु भी इस व्यवस्था के लिए कोई मायने नहीं रखती। अस्पताल ने यह साफ कर दिया कि “पैसे लाओ, खून लाओ, वरना मर जाओ – और मरने के बाद अपनी लाश भी खुद संभालो।”
पुलिस का ‘मानवता पाठ’
इस पूरे प्रकरण में अगर किसी ने मानवता की चमक दिखाई, तो वह गढ़ा थाना की पुलिस थी। हालांकि पुलिस के प्रति जनता का विश्वास पहले से ही डगमगाया हुआ है, लेकिन इस घटना में उन्होंने खाना खिलाकर और एम्बुलेंस का इंतजाम कर इस लाश-तंत्र को थोड़ी देर के लिए ढकने का प्रयास किया।
मेडिकल प्रशासन की “अनभिज्ञता”
मेडिकल अधीक्षक का कहना कि उन्हें घटना की जानकारी नहीं है, यह बयान ‘नकली नींद’ में सोने वाले सरकारी अधिकारियों का शाश्वत सत्य है। अगर उनसे पूछो कि उन्हें किस चीज़ की जानकारी है, तो शायद जवाब में वे अपना पद और नाम भी भूल जाएं।
यह घटना यह साबित करती है कि हम सिर्फ कंक्रीट की इमारतों में रह रहे हैं, जहां संवेदनाएं, जिम्मेदारियां और नैतिकता दीमक खा चुकी है। जबलपुर मेडिकल कॉलेज का यह मामला हमारे देश की “खोखली स्वास्थ्य व्यवस्था” का सबसे जीवंत उदाहरण है। गरीब मरीजों के लिए यह एक “सिस्टमेटिक नरक” बन चुका है, जहां इलाज नहीं, बल्कि असंवेदनशीलता परोसी जाती है।
क्या हम इस बात पर गर्व करें कि पुलिस ने शव को गांव भिजवाया? या इस पर शर्म करें कि अस्पताल ने शव को सड़क पर छोड़ दिया?  यह घटना  सड़ी-गली व्यवस्था का पोस्टमॉर्टम है, जिसका खून अब सिस्टम से सूख चुका है।

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Kailash Pandey
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