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मुर्गों का लोन और लोन का मुर्गा एक मुर्गा की गाथा

मुर्गों का लोन और लोन का मुर्गा एक मुर्गा की गाथा


देश के ग्रामीण जीवन की कहानियां कभी-कभी ऐसी होती हैं, जो सुनने में तो हास्यास्पद लगती हैं, लेकिन असल में एक कड़वी सच्चाई को उजागर करती हैं। ऐसा ही मामला छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के किसान रूपचंद मनहर का है, जिसने अपने 12 लाख के कृषि लोन के लिए देसी मुर्गा-न्याय प्रणाली से गुजरते हुए 38,900 रुपये के देसी मुर्गे गवां दिए।
लोन का सपना और मुर्गों की शुरुआत
कहानी की शुरुआत होती है रूपचंद के कृषि विकास के सपने से। उन्होंने सोच लिया था कि अगर 12 लाख का लोन मिल जाए तो वह खेत में नहर खुदवाएंगे, ट्रैक्टर खरीदेंगे और अपने गांव को एक नई ऊंचाई पर ले जाएंगे। लेकिन बैंक मैनेजर ने उनसे कहा, सपने सच करना चाहते हो तो पहले हमसे रिश्ते मजबूत करो।
रिश्ते मजबूत करने के नाम पर मैनेजर ने पहला मुर्गा मंगवाया। भाई, देसी मुर्गा तो तुम्हारे गांव की शान है। ऐसा स्वाद कहीं नहीं मिलेगा,कहकर उसने पहला देशी मुर्गा लिया।
मुर्गा-कमीशन गठजोड़
कमीशन की बात करते हुए किसान से 1.20 लाख रुपये अग्रिम रूप में लिए गए। यह तो प्रक्रिया का हिस्सा है, मैनेजर ने कहा। लेकिन इसके बाद हर शनिवार मुर्गा फेस्टिवल का आयोजन बैंक मैनेजर के घर होने लगा। मुर्गे की ग्रेवी में बैंक मैनेजर के चेहरे पर ऐसी चमक आ जाती थी, जैसे उसने कोई राष्ट्रीय पुरस्कार जीत लिया हो।
मुर्गा पार्टी और किसान की बेचैनी
शुरुआत में रूपचंद को लगा कि यह रिश्ता मजबूत करने का जरिया है। लेकिन जैसे-जैसे शनिवार आते गए, मुर्गों की संख्या बढ़ती गई। उधर, लोन की फाइल बैंक के टेबल पर धूल खा रही थी, और इधर मैनेजर के पेट में देसी मुर्गा की खपत ।
जब रूपचंद ने सवाल किया तो मैनेजर ने कहा, प्रक्रिया चल रही है, थोड़ा सब्र रखो। अगले शनिवार तक फाइल आगे बढ़ जाएगी।
जब महीनों तक लोन नहीं मिला और मुर्गे खत्म हो गए, तो रूपचंद को एहसास हुआ कि यह कोई कागजी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मुर्गा प्रक्रिया चल रही है।
किसान ने आखिरकार हिम्मत जुटाकर SDM कार्यालय में शिकायत कर दी। उनका कहना था, अगर इंसाफ नहीं मिला तो मैं आत्मदाह कर लूंगा।
बैंक और मुर्गा अर्थशास्त्र
बैंक कर्मचारियों और दलालों का गठजोड़ देखने सुनने पढ़ने को मिल ही जाता है, जो ग्रामीण भारत के किसानों के सपनों पर कबूतर उड़ाते हुए मुर्गा खा जाते हैं।
मुर्गा-लोन की प्रक्रिया बैंक मैनेजर के लिए यह पूरा मामला लोन नहीं, मौज जैसा था।
कमीशन का नया मॉडल अब कमीशन के  पैसों  के साथ में मुर्गों  को  लिया दिया जाता है। यह ग्रामीण रिश्वताचार का एक नया नवाचार है।
किसान का संघर्ष रूपचंद जैसे लोग  आज भी सिस्टम के शिकार हैं, जहां उनकी मेहनत का लाभ केवल मुर्गों की हड्डियों में छिपा है।
भारत में किसानों को दो चीजों से सबसे ज्यादा खतरा है—एक बिचौलियों से और दूसरा भूखे बैंक मैनेजरों से। जब तक यह गठजोड़ तोड़ा नहीं जाएगा, न किसान को लोन मिलेगा, न उसका मुर्गा बचेगा।

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