कक्का की चौपाल…कैलाश पाण्डेय “फाइलों में बंद सच और जनता से पूछताछ”

कोतमा बस स्टैंड के पास चार मंजिला अग्रवाल लॉज के ढहने के बाद मजिस्ट्रियल जांच तो बैठ गई, पर चौपाल में बहस उससे भी पहले बैठ गई। कक्का की चौपाल में आज मुद्दा साफ था “जवाब फाइलों में हैं, फिर सवाल जनता से क्यों?”
घसीटा ने आते ही मोर्चा खोल दिया “चौरंगी लाल! बताओ, ये जो जांच में पूछा जा रहा है कि नक्शा था या नहीं, अनुमति थी या नहीं… ये सब जनता बताएगी क्या?”
चौरंगी लाल ने कुर्सी संभालते हुए जवाब दिया “देखो घसीटा, प्रक्रिया है… हर पक्ष से साक्ष्य लेना पड़ता है।”
घसीटा गुस्सा हो उठा “प्रक्रिया के नाम पर पहेली क्यों बुझा रहे हो? नक्शा नगर पालिका में, अनुमति नगर पालिका में, फाइल नगर पालिका में… फिर जनता क्यों?”
चौरंगी लाल मुस्कुराया “ताकि अगर किसी के पास अतिरिक्त जानकारी हो तो सामने आए।”
घसीटा ने तंज कसा “अतिरिक्त जानकारी या अतिरिक्त बहाना? असली फाइल तो अलमारी में बंद है!”
चौरंगी लाल ने बचाव किया“देखो, लाज के साथ बगल में जो गड्ढा खुदा, उसकी भी जांच होगी।”
घसीटा तुरंत बोला “और उसकी अनुमति किसने दी? ये भी जनता बताएगी या फाइल?”
चौरंगी लाल थोड़े गंभीर हुए “वो रिकॉर्ड में ही मिलेगा, मानता हूं।”
घसीटा ने सवाल किया “तो फिर सीधे-सीधे रिकॉर्ड खोलो न! जनता से कागज मांगकर क्या साबित करना चाहते हो?”
चौरंगी लाल बोले “अगर जनता दस्तावेज नहीं देगी, तब जांच प्रशासनिक रिकॉर्ड पर ही आगे बढ़ेगी।”
घसीटा हंसा “मतलब अंत में जाना वहीं है, जहां से शुरू होना चाहिए था!”
चौरंगी लाल ने समझाने की कोशिश की “जांच में नगर पालिका की फाइलें, स्वीकृत नक्शे, अनुमति पत्र, निरीक्षण रजिस्टर सब खंगाले जाएंगे।”
घसीटा बोला “और अफसर?”
चौरंगी लाल “उपयंत्री,राजस्व, इंजीनियर, सीएमओ सबकी जिम्मेदारी तय होगी, अगर लापरवाही मिली।”
घसीटा ने फिर कहा “तीन लोग मर गए, अब भी ‘अगर’ बोल रहे हो?”
चौरंगी लाल चुप सा पड़ा “जांच के बाद ही निष्कर्ष आएगा…”
घसीटा ने आखिरी सवाल किया “जांच तब सच्ची होगी जब फाइल खुद बोलेगी, न कि जनता से कहलवाया जाएगा।”
कक्का, जो अब तक चुप थे, धीरे से बोले—“मजिस्ट्रियल जांच का मतलब है सच को बाहर लाना, न कि उसे कागजों में घुमाना।”
चौपाल में सन्नाटा छा गया। बात साफ थी अगर जनता दस्तावेज नहीं देगी, तो जांच को फाइलों, रिकॉर्ड और जिम्मेदार अफसरों के जवाबों पर ही टिकना होगा।
और असली सवाल अब भी वही था क्या इस बार फाइलें खुलेंगी, या फिर सच भी अग्रवाल लॉज की तरह भरभरा कर मलबे में दबा रह जाएगा?

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