
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने शराब उत्पादन क्षेत्र की प्रमुख कंपनी सोम डिस्टलरीज से जुड़ी रिट अपील का निपटारा कर दिया है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि जब किसी लाइसेंस की समय सीमा समाप्त हो जाती है, तो उससे संबंधित कानूनी विवाद का आधार भी खत्म हो जाता है। अदालत ने इसे तकनीकी रूप से निष्प्रभावी करार देते हुए राहत देने से इनकार कर दिया।
लाइसेंस की अवधि और निलंबन का आधार
यह कानूनी विवाद सोम डिस्टलरीज के कर्मचारियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 470 और 120-बी के तहत मिली सजा के बाद शुरू हुआ था। इस सजा को आधार बनाते हुए आबकारी आयुक्त ने फरवरी 2026 में कंपनी के 8 लाइसेंस निलंबित कर दिए थे। कंपनी ने इस कार्रवाई को अदालत में चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि कर्मचारियों को आबकारी अधिनियम के तहत दोषी नहीं पाया गया है, इसलिए लाइसेंस रद्द करना अनुचित है। कंपनी का यह भी कहना था कि संबंधित सजा के विरुद्ध अपील लंबित है और वर्तमान में उस पर रोक लगी हुई है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि 31 मार्च 2026 को लाइसेंस की निर्धारित अवधि पूरी हो चुकी है, जिसके बाद अब पुराने निलंबन पर विचार करने का कोई औचित्य नहीं है।
वित्तीय घाटे का दावा और स्टॉक निपटान के नियम
सुनवाई के दौरान कंपनी की ओर से 122 करोड़ रुपये के स्टॉक के फंसे होने और इससे होने वाले भारी आर्थिक नुकसान का मुद्दा भी उठाया गया। कंपनी ने दलील दी कि लाइसेंस निलंबित होने से न केवल उसे घाटा हुआ, बल्कि राज्य सरकार को भी लगभग 79 करोड़ रुपये के राजस्व की हानि हुई है। इस पर खंडपीठ ने कहा कि स्टॉक के प्रबंधन और निपटान के लिए कानून में पहले से ही पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं। नियमों के अनुसार, बचे हुए स्टॉक को किसी अन्य लाइसेंसधारी को बेचा जा सकता है या फिर राज्य सरकार इसे निर्धारित दरों पर अधिग्रहित कर सकती है। अदालत ने साफ किया कि लाइसेंस का नवीनीकरण एक स्वतंत्र वैधानिक प्रक्रिया है और सक्षम प्राधिकारी कानून के तहत ही इस पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। मामले में सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत रूपराह और हस्तक्षेपकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय के अग्रवाल ने दलीलें पेश कीं।
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