माता सीता के निर्वासन और शंबूक वध की कथाओं को जगद्गुरु ने बताया षड्यंत्र

जबलपुर में जगद्गुरु रामभद्राचार्य की श्रीरामकथा के आठवें दिन युद्धलीला का सजीव चित्रण

जबलपुर। तुलसी पीठाधीश्वर पद्म विभूषण जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य ने जबलपुर के आयुर्वेद कॉलेज मैदान स्थित अवधपुरी पंडाल में आयोजित श्रीरामकथा के आठवें दिन श्रीरामचरितमानस की गूढ़ व्याख्या की। समरसता सेवा संगठन द्वारा आयोजित राम जनम जग मंगल हेतू विषयक इस कथा में महाराजश्री ने युद्धलीला के प्रसंग सुनाते हुए मातृशक्ति, हिंदू संस्कृति और भारत की श्रेष्ठता पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित मानस कोई अनुवाद नहीं है, बल्कि यह उनकी साधना और खोज का परिणाम है। उनके अनुसार तुलसीदास जी ने गुरु परंपरा से प्राप्त कथा को शिवजी के मानस प्रसाद के रूप में जनभाषा में निबद्ध किया है ताकि अंतःकरण के संताप को शांत किया जा सके।

भारतीय दर्शन में नारी और पत्नी की गरिमा

​महाराजश्री ने पाश्चात्य और भारतीय दर्शन के बीच का मूलभूत अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि पश्चिमी संस्कृति में नारी को केवल उपभोग की वस्तु माना गया है, जबकि भारतीय मनीषा में पत्नी का स्थान बहुत ऊंचा है। उन्होंने बताया कि जो अपने पति को पतन के मार्ग से बचाकर सन्मार्ग पर ले आए, वही वास्तव में पत्नी है। महर्षि पाणिनी के सूत्रों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पत्नी वासना की पूर्ति का साधन नहीं बल्कि ईश्वर प्राप्ति का माध्यम है। मनुस्मृति का पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि मनु जी ने नारी को सदैव पूजनीय माना है। कथा के दौरान उन्होंने वह प्रसंग भी सुनाया जब प्रभु श्रीराम स्वयं सीताजी को वस्त्र धारण कराते हैं, जो शक्ति की आराधना का प्रतीक है।

श्रीराम के स्वरूप और जनमानस की शंकाओं का समाधान

​कथा के दौरान जगद्गुरु ने भक्तों की विभिन्न जिज्ञासाओं का समाधान किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि माता सीता का कभी निर्वासन नहीं हुआ और न ही किसी धोबी ने उनकी निंदा की थी। उन्होंने बताया कि लव और कुश का जन्म राजभवन में हुआ था और वे केवल शिक्षा ग्रहण करने के लिए वाल्मीकि आश्रम गए थे। इसी प्रकार उन्होंने श्रीराम द्वारा शंबूक वध की घटना को भी सनातन धर्म को नीचा दिखाने के लिए रचा गया षड्यंत्र करार दिया। सीता हरण के प्रसंग पर उन्होंने बताया कि रावण ने जिसका हरण किया वह केवल मायावी रूप था, जबकि वास्तविक सीता अग्नि देव के संरक्षण में थीं।

मंदाकिनी की महिमा और श्रीराम के प्रिय होने के कारण

​स्वामी रामभद्राचार्य ने श्रीराम के व्यक्तित्व की विशेषता बताते हुए कहा कि वे अपने ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य, तेज, बल और वीर्य जैसे छह प्रमुख गुणों के कारण समस्त सृष्टि के प्रिय हैं। उन्होंने चित्रकूट की मंदाकिनी नदी की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वयं गंगा, यमुना और नर्मदा जैसी पवित्र नदियां भी मंदाकिनी की महिमा का गुणगान करती हैं, क्योंकि वहां सीता-राम निरंतर निवास और स्नान करते हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने कर्तव्य पथ पर निरंतर चलते रहने को ही वेद का वास्तविक सिद्धांत बताया।

सामाजिक समरसता और यजमानों द्वारा पादुका पूजन

​कथा के प्रारंभ में आचार्य रामचंद्रदास के सानिध्य में रामानंदाचार्य पीठ की प्राचीन पादुकाओं का पूजन किया गया। पूजन करने वालों में हितानंद शर्मा, रत्नेश सोनकर, नीरज सिंह, एस पी गौतम, हरप्रीत सिंह रुपराह, विवेक शर्मा, संजय अग्रवाल, आशीष शुक्ला, ऋचा धीरावानी, जतिन धीरवानी, कल्पना पचौरी, राजेश गुप्ता, प्रमोद पंडा, अंजली मनीष खरे, सुरेन्द्र राजपूत, राज वर्मा, आशीष राय, जितेन्द्र जामदार, संदीप जैन और अखिल मिश्रा शामिल रहे। समरसता सेवा संगठन के अध्यक्ष संदीप जैन ने बताया कि समाज की एकता के लिए इस बार 41 विभिन्न समाजों के प्रतिनिधियों को यजमान बनाया गया है।

प्रशासनिक हस्तियों की उपस्थिति और समापन की सूचना

​कथा के विश्राम अवसर पर आरती में डॉ प्रदीप दुबे, न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी, कृष्णमूर्ति मिश्र, डॉ अरविंद शर्मा, डॉ ऋचा शर्मा, प्रकाश मालपानी, लेखराज सिंह, कुलगुरु पी के मिश्रा, सुरेश आसवानी, तारु खत्री, एल एल अहिरवार, सुधीर भागचंदानी, प्रदीप गुप्ता, राजा सराफ, संदीप रजक, गोकुल केसरवानी, शरद अग्रवाल, जितेन्द्र अवस्थी, आशीष त्रिवेदी, सनत कुमार त्यागी, विकास त्रिपाठी, डॉ पुष्पराज पटेल, डॉ विजय सिंह यादव, रामेश्वरी पाठक, डॉ आर के गुप्ता, ओंकार दुबे, अभय सिंह, जितेन्द्र तिवारी, एकता ठाकुर, अखिलेश दीक्षित, रत्नेश मिश्रा, गुड्डा त्रिपाठी, राजेश मिश्रा, नमन मल्होत्रा और पीयूष जैन ने सहभागिता की। आयोजन के अंतिम दिन प्रसिद्ध गायिका इशिता विश्वकर्मा भजनों की प्रस्तुति देंगी।

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