
शहर के बीचों-बीच स्थित एक व्यस्त चौराहा इन दिनों विकास के अधूरे सच का आईना बना हुआ है। चारों दिशाओं में जाती सड़कें, किनारे अधूरी नालियाँ, आधा बना पुलिया और निर्माणाधीन भवन—सब मिलकर एक ही कहानी कहते हैं कि योजनाएँ पूरी होने से पहले ही ‘पूरी घोषित’ हो जाती हैं।
चौराहे पर पड़े सीमेंट, गिट्टी और सरियों के ढेर यह साबित करते हैं कि यहाँ काम की कमी नहीं है वहीं सड़क, वही नाली, वही पुलिया, वही भवन मरम्मत सब कुछ बन सकता है। इंजीनियर भी मौजूद हैं, सरकारी अमला भी सक्रिय दिखता है… लेकिन विकास अब भी अधूरा है।
इसी चौराहे के किनारे चौपाल में बैठे कक्का के सामने घसीटा और चौरंगी लाल इस पूरे मंजर पर चर्चा कर रहे थे।
घसीटा ने तीखा सवाल उठाया
“कक्का, अब तो राजनीति भी रोजगार बन गई है। वार्ड से लेकर जिला तक पद ही पद हैं… पर काम कहीं नजर नहीं आता!”
चौरंगी लाल ने तुरंत तंज कसा
“अरे काम क्यों नहीं दिखता? फेसबुक खोल… पार्षद जी, नेता जी और अफसर जी—तीनों मिलकर ऐसा विकास दिखाते हैं कि लगता है शहर स्वर्ग बन गया!”
घसीटा ने कटाक्ष करते हुए कहा
“हाँ, और जमीन पर सड़क ऐसी बनती है जैसे दिखावे की मिठाई ऊपर चमकदार, अंदर खोखली!”
चौरंगी लाल हँसते हुए बोला
“तू समझता नहीं घसीटा! ये काम कोई छोटा-मोटा नहीं है… पार्षद, नेता और अधिकारी इनसे बड़ा इंजीनियर कोई नहीं!”
घसीटा ने तुरंत जवाब दिया
“सही कहा! ये लोग बिना मशीन के ही परत चढ़ा देते हैं—कागजों में सड़क, भाषणों में नाली, और फोटो में पुलिया तैयार!”
पास बैठे कक्का मुस्कुराए और बोले
“बेटा, ये सिर्फ निर्माण नहीं, ‘प्रबंधन कला’ है—जहाँ काम कम और प्रचार ज्यादा होता है।”
चौरंगी लाल ने आगे जोड़ा
“यहाँ पहले काम का उद्घाटन होता है, फिर काम शुरू होता है, और खत्म होने से पहले ही अगला उद्घाटन तय हो जाता है!”
घसीटा ने सिर हिलाते हुए कहा
“और ठेकेदार, अधिकारी और नेता—तीनों की ऐसी जुगलबंदी कि जनता बस दर्शक बनकर रह जाती है।”
तभी चौराहे से एक ट्रैक्टर गुजरा। ताज़ा बनी सड़क पर पानी छिड़का जा रहा था, जबकि बगल में नाली अधूरी पड़ी थी।
चौरंगी लाल ने इशारा किया
“देख… ये है असली विकास! सड़क तैयार, नाली इंतजार में, पुलिया अधूरी… लेकिन फोटो पूरी!”
घसीटा ने तीखा तंज मारा “और जांच? वो भी रिपोर्ट में पास हो जाती है—जमीन पर चाहे फेल हो!”
कक्का ने गंभीर होकर कहा “जनता सब देखती है… पार्षद, नेता और अधिकारी—तीनों के खेल को समझती है। लेकिन बोलती नहीं, क्योंकि उसे भरोसा कम और मजबूरी ज्यादा है।”
घसीटा ने आक्रोश में कहा “पर कब तक यही चलता रहेगा? पद बांटो, काम टालो, और वाहवाही लूटो!”
चौरंगी लाल ने मुस्कुराते हुए अंतिम वार किया
“जब तक जनता ‘लाइक’ और ‘शेयर’ में व्यस्त है, तब तक पार्षद, नेता और अधिकारी तीनों मिलकर कागजों में शहर बनाते रहेंगे।”
कक्का ने निष्कर्ष में कहा
“याद रखो… असली विकास ना भाषण में होता है, ना फोटो में वो जमीन पर दिखता है। और जब जमीन ही कमजोर हो, तो कोई भी व्यवस्था टिक नहीं सकती।”
चौराहे पर हलचल जारी है…
सड़क चमक रही है, नाली अधूरी है, पुलिया इंतजार में है…
और इस पूरे खेल में एक बात साफ है
पार्षद, नेता और अधिकारी इनसे बड़ा ‘खिलाड़ी’ फिलहाल कोई नहीं!



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