
नेताजी का वरदहस्त, अफसर बदलते गए — कब्जा वहीं का वहीं!
अमरकंटक में प्रशासनिक कुंभकरण 1 साल, 8 अफसर, 0 कार्रवाई!
नर्मदा उद्गम की त्रासदी – धर्मशाला घिरा कब्जाधारियों से, प्रशासन बना मूकदर्शक!
नोटिस भेजे, अफसर बदले, पर कब्जा आज भी डटा है जय हो नेतागिरी!



अधिकारियों का आना-जाना जारी, कार्रवाई का पता नहीं अमरकंटक में अतिक्रमण अमर!
मध्यप्रदेश की पवित्र नगरी अमरकंटक, जहां मां नर्मदा का उद्गम है, वह आज नेतागिरी समर्थित अतिक्रमण का तीर्थ स्थल बन चुकी है। यहां आस्था है, पुरातनता है, श्रद्धा है – पर इन सबसे बड़ी चीज़ अब है “सत्ताश्रयित कब्जा”।
कहानी है रामबाई धर्मशाला की, जिसके सामने कई साल से अतिक्रमणकारी काबिज हैं।
पंडित शिवप्रसाद गौतम जी, जो इस धर्मशाला के संचालक हैं, प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री हेल्पलाइन तक गुहार लगाते रहे।
लेकिन जवाबों की स्याही तो मिली, न्याय की कलम आज भी टूटी हुई है।
नोटिस भेजने की परंपरा – ‘कागजों का हवन’
नगर परिषद् अमरकंटक एक अनूठा विभाग है। वहां कार्रवाई नहीं, “नोटिस महायज्ञ” होता है।
हर शिकायतकर्ता को “हम जल्द कार्रवाई करेंगे”, “टीम भेजेंगे”, “नोटिस जारी किया जा चुका है” जैसे मंत्र दिए जाते हैं।
जैसे कोई ‘भस्म’ लगा दे और समस्याएं अदृश्य हो जाएं।
शिवप्रसाद जी कहते हैं,
“पिछले एक वर्ष में हमने इतनी बार नगर परिषद् का दरवाज़ा खटखटाया कि शायद अब वहां की दीवारें भी हमारी पहचानने लगी हैं।”
लेकिन अफसोस, नोटिस भेजने के बाद नगर परिषद् की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है।
फिर अतिक्रमणकारी इन नोटिसों को गुटखा थूकने या कचरा फेंकने के लिए काम में लेते हैं।
‘नेता कार्ड’ – वह गुप्त हथियार, जिससे अतिक्रमण पक्का होता है

इन अतिक्रमणकारियों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे किसी राजनीतिक परिवार की छाया में रहते हैं।
उनका पास कोई रेशन कार्ड नहीं, कोई वोटर ID नहीं,
लेकिन उनके पास है – “भाजपा नेता जी का फोन नंबर”।
जिस दिन प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने की टीम भेजी – SDM, CMO, पुलिस बल –
उसी दिन नेताजी ने “सीधा संवाद” किया
“अरे इन्हें क्यों हटाने चले हो? ये तो मेरे जानकार हैं। देख लेंगे ना बाद में।”
और बस फिर क्या था –
कब्जा यथावत, प्रशासन निराश्रित और नियम-कायदे नेताजी के अभयदान के सामने लाचार।
रामबाई धर्मशाला के सामने अब धार्मिक आयोजन नहीं, कूड़ा उत्सव होता है।
गेट के सामने कपड़े धोना, बर्तन मांजना, खुले में शौच, बच्चे पॉटी करते हुए —
यह सब “ग्रामीण जीवन दर्शन” का हिस्सा माना जाने लगा ।
कलेक्टर बदले, आदेश बदले – पर कब्जा नहीं बदला
दो कलेक्टर बदले
दो SDM बदले
चार CMO बदले
तीन बार जनसुनवाई में आवेदन
दो बार मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर शिकायत
एक बार तहसील स्तर पर प्रत्यक्ष सुनवाई
लेकिन अतिक्रमणकारी वही हैं, उसी गेट के सामने, उसी धौंस के साथ।
मानो नगर परिषद् ने उन्हें “स्थायी अतिथि” घोषित कर दिया हो।
जब पूर्व SDM पुष्पराजगढ़ श्री महीपाल गुर्जर ने नगर परिषद् को स्पष्ट आदेश दिए कि कब्जा हटाया जाए,
तो वह आदेश भी फाइलों की कब्रगाह में दफन हो चुकी है
अमरकंटक, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु मां नर्मदा का दर्शन करने आते हैं,
अब वहां कूड़ा, गंदगी और राजनीतिक संरक्षण श्रद्धा के आगे खड़े हो गए हैं।
यह एक विडंबना है कि जहां स्वच्छता, मर्यादा और संयम की बात होती है,
वहीं गेट के सामने बैठा एक कब्जाधारी परिवार पूरे वातावरण को अपवित्र करता है —
और प्रशासन उसे देखकर चुप है।
यह आस्था नहीं, व्यवस्था की हार है।
यह संविधान का उपहास है।
यह लोकतंत्र में सत्ता के निजीकरण का उदाहरण है।
जब आस्था बेबस हो और सत्ता गूंगी
पंडित शिवप्रसाद गौतम जी, जो स्वयं सिकल सेल रोग से पीड़ित हैं,
अब भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन ये कब्जा हटेगा,
लेकिन दिन बीतते हैं, सप्ताह बीतते हैं, अफसर बदलते हैं,
पर इस कब्जे की जड़ें नेतागिरी की खाद से मजबूत होती जाती हैं।
यह कोई एक धर्मशाला की बात नहीं —
यह कहानी है उस व्यवस्था की,
जो नेताओं के कहने पर रुकती है,
और नागरिकों की फरियाद पर ऊंघती है।
अब क्या करें? तंत्र को जगाएं या धर्मशाला बंद करें?
शिवप्रसाद जी ने सवाल उठाया है
“अगर प्रशासन और शासन मिलकर भी कब्जा नहीं हटा सकते,
तो क्या हमें धर्मशाला बंद कर देनी चाहिए?”
यह सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं,
यह सवाल है हर उस भारतीय का,
जो न्याय की उम्मीद लेकर सरकारी दफ्तर जाता है,
और जब ऑफिस में अमर वाक्य गूंजने‘ लगते हैं हम देख रहे हैं’ कर रहे हैं दिखवाते है कल आना परसो आना आज बहुत जरूरी काम है साहब मीटिंग में गए हैं जिसके पास आपका कागज है आज नहीं आए अनूपपुर जिले के सरकारी दफ्तरों में सुनने को मिलेगा अगर आपने नहीं सुना आप तो कोई काम या समस्या लेकर किसी भी दफ्तर में चले जाइए सुनने को मिल जाएगा।
‘अतिक्रमण सम्मान योजना’ का अमरकंटक संस्करण
अब नगर परिषद् को चाहिए कि वह खुलेआम घोषणा करे
“जो कब्जा करे, वही सच्चा नागरिक।”
“नेताजी से सिफारिश लाओ, फिर धर्मशाला के गेट पर अपना झोला फैलाओ।”
“हम कार्रवाई नहीं करते, बस नोटिस बाँटते हैं।”
यह स्वच्छ भारत मिशन का उल्टा पाठ है,
यह जनता के विश्वास का अपमान है,
और यह राजनीतिक अवसरवाद का प्रतीक है।
“नेताजी का आशीर्वाद पाओ, धर्मशाला पर कब्जा जमाओ — अमरकंटक की नयी रीति यही है।”
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