
पुरानी भट्टी के सामने पसीने में डूबा चेहरा, हथौड़ा उठाते हाथ, धुएं और ग्रीस की गंध, मशीनों की घरघराहट, और फैक्ट्री सायरन की गूंज। इसी में से निकलता है वह स्वर – “मैं मजदूर हूं!”
मजदूर एक ऐसा पात्र जो सभ्यता की नींव का पत्थर रहा, पर जिसका इतिहास सदा छिपा रहा।
यह कहानी है उसके संघर्ष की – जो पत्थरों से लेकर पिक्सल तक, खेतों से लेकर कोडिंग लैब्स तक, हर जगह रहा, पर हमेशा अज्ञात।
जब मानव बना निर्माता
मानव सभ्यता का इतिहास श्रम से जुड़ा है। जब इंसान ने पत्थर को औजार बनाया, तब वह पहला श्रमिक बना। खेती की खोज के साथ कृषि मजदूर पैदा हुए। हड़प्पा सभ्यता के श्रमिक हों या मिस्र के पिरामिड बनाने वाले गुलाम – श्रमिक इतिहास के हर मोड़ पर मौजूद रहे।
1 मई को दुनिया भर में मजदूर दिवस मनाया जाता है, लेकिन भारत के कई क्षेत्रों विशेष रूप से मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले में आज भी मजदूरों की हालत बद से बदतर बनी हुई है। कोयला खदानों से लेकर अन्य सरकारी-निजी संस्थानों तक, मजदूरों का शोषण एक सुनियोजित षड्यंत्र के रूप में चल रहा है, जिसमें समाजसेवा की खाल ओढ़े सफेदपोश नेता , और नौकरशाही, ठेकेदार सम्मिलित हैं।
ठेका प्रथा का दुरुपयोग मजदूरों को तयशुदा न्यूनतम मजदूरी से आधा वेतन दिया जाता है। बाक़ी हिस्सा ठेकेदार व अधिकारियों की मिलीभगत से हड़प लिया जाता है।
फर्जी दस्तावेज़ उपस्थिति रजिस्टर, ट्रेनिंग प्रमाणपत्र, मेडिकल सर्टिफिकेट सभी में फर्जीवाड़ा किया जाता है।
आउटसोर्सिंग का छलावा नाम मात्र का संविदा रोजगार देकर, पूरी सेवा शर्तें भंग की जाती हैं।
मजदूरी की जब्ती मजदूर के खाते में वेतन जमा करवा कर उसे वापस ठेकेदार को लौटाने की दबावकारी प्रणाली।
मजदूरों की हालत को छुपाने के लिए लोगों को गुमराह कर मैनेज किया जाता है।
सोशल मीडिया पर झूठे पोस्ट करके ठेकेदार और नेता स्वयं को समाजसेवी घोषित करते हैं।
मजदूरों की चीखें, विरोध और बहिष्कार प्रशासन से दूर रखे जाते हैं।
मजदूरों की सामाजिक स्थिति
भूमिगत कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूरों की जान जोखिम में होती है, फिर भी उन्हें बीमा, मेडिकल सुविधा नहीं मिलती। उनकी आधी मजदूरी नेतानुमा ठेकदार खा जाते हैं
आउटसोर्स कर्मचारियों की कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं होती। वे हमेशा नौकरी से निकाले जाने के डर में जीते हैं।
प्रशासन और न्याय व्यवस्था की भूमिका
मालूम जिम्मेदार अधिकारियों रहता है लेकिन नेतागिरी का दबाव और मजदूरी का कुछ अंश उन्हें भी मिलता है इसलिए उन्हें पालते हैं कार्यवाही नहीं करते।
जब भी कोई शिकायत होती है, तो उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
नेताओं और अफसरों के रिश्ते इन अपराधों को संरक्षण देते हैं।
समाधान के संभावित उपाय स्वतंत्र जांच आयोग की नियुक्ति।
हर खदान/संस्थान में CCTV निगरानी और मजदूरी निगरानी पोर्टल।
मजदूर संगठनों को स्वतंत्रता और कानूनी संरक्षण।
अनूपपुर जिले की यह स्थिति देश के सामने एक उदाहरण है कि कैसे सत्ता और प्रशासन की मिलीभगत से मजदूरों को लगातार शोषण किया जा रहा है। यह मजदूर दिवस तब तक अधूरा है जब तक हर मजदूर को न्याय, सुरक्षा और सम्मान नहीं मिलता
अंतिम शब्द
मैं मजदूर हूं।
मैं निर्माण हूं, मैं शक्ति हूं।
तू कितना भी बड़ा मालिक बन जाए,
तेरा सिंहासन भी मेरे हाथों की मेहनत से बना है।
आज नहीं तो कल – मुझे मेरा हक मिलेगा,
क्योंकि इतिहास का हर मोड़ मेरी हथौड़े की चोट से बना है।



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