
नवजात शिशु का हृदयविदारक प्रकरण
7 फरवरी 2025 को अनूपपुर–अमरकंटक मुख्य मार्ग के मध्य ग्राम पंचायत सकरा के छीरापटपर के जंगल में, एक पुल के नीचे एक झोले में नवजात शिशु बालिका का शव बरामद हुआ। पुलिस की प्रारंभिक जांच से पता चलता है कि यह शव एक-दो दिन पुराना हो सकता है। निरीक्षक अरविंद जैन के निर्देश पर मौके पर पहुंचकर सहायक उप निरीक्षक संतोष पांडेय समेत पुलिस दल ने शव को जिला चिकित्सालय में सुरक्षित करते हुए अज्ञात अपराधियों की तलाश शुरू कर दी है।


परिवारों में खुशियों का पुनर्मिलन – गुमशुदा व्यक्तियों की वापसी
इसी जिले के अन्य थानों में पुलिस की मेहनत रंग लाई है। कोतमा पुलिस ने दो गुमशुदा व्यक्तियों को विभिन्न स्थानों से दस्तयाब कर उनके परिवारजनों को सुपुर्द किया। साथ ही, भालूमाड़ा थाना ने ऑपरेशन ‘मुस्कान’ के तहत गुमशुदा लक्ष्मी (परिवर्तित नाम) नामक 17 वर्षीय नाबालिग लड़की को ढूंढ़कर उसके परिजनों से मिलवाया। ये सफलतापूर्वक पुनर्मिलन समाज में विश्वास और आशा की नई किरण जगाते हैं।

सामाजिक मजबूरियाँ – क्या थी वजह ऐसा घृणित कृत्य करने की?
जब पुलिस अपने प्रयासों से गुमशुदा व्यक्तियों को उनके परिवारों से मिलाने में सफल हो रही है, तो वहीं नवजात शिशु के शव को झोले में फेंकने जैसा अपराध समाज के अंधेरे पहलुओं की ओर इशारा करता है।
आर्थिक तंगी एवं सामाजिक कलंक
कुछ परिवार अत्यंत आर्थिक तंगी और सामाजिक कलंक के बोझ तले दब जाते हैं। यदि नवजात शिशु, विशेषकर बालिका, जन्म लेने पर पारिवारिक भविष्य को लेकर आशंकाएँ उत्पन्न होती हैं तो अकल्पनीय निर्णय लिए जाने का खतरा बढ़ जाता है।
लिंगभेद एवं पारिवारिक दबाव
समाज में लिंगभेद की प्रथा, जहां बालिकाओं को आर्थिक बोझ या सामाजिक जिम्मेदारियों के रूप में देखा जाता है, कभी-कभी अपराध की ओर भी ले जाती है। पारिवारिक दबाव, निजी प्रतिष्ठा और सामुदायिक विचारधारा भी इस दिशा में कारक हो सकते हैं।
मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक असंतुलन
अत्यधिक तनावपूर्ण पारिवारिक वातावरण, मानसिक असंतुलन या अज्ञात पारिवारिक समस्याएँ भी कभी-कभी ऐसे घोर अपराधों का आधार बन जाती हैं।
इन घटनाओं में दो अत्यंत विपरीत पहलुओं को देखा जा सकता है। एक ओर पुलिस द्वारा गुमशुदा व्यक्तियों को उनके परिजनों से मिलाकर परिवारों में पुनः खुशियाँ लौटाई जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर नवजात शिशु के साथ ऐसा घृणित कृत्य समाज के उन अंधेरे पहलुओं की ओर संकेत करता है, जहाँ आर्थिक तंगी, लिंगभेद और पारिवारिक दबाव जैसी मजबूरियाँ अपराध की दिशा में ले जाती हैं।



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