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संस्कारों का विभाजन पिता के अंतिम संस्कार के लिए बेटे ने मांगा शव के दो टुकड़े

संस्कारों का विभाजन पिता के अंतिम संस्कार के लिए बेटे ने मांगा शव के दो टुकड़े



समाज में पारिवारिक रिश्तों का महत्व और उनकी पवित्रता सदा से भारतीय संस्कृति की नींव रही है। जीवन और मृत्यु के बीच एक गहरी कड़ी होती है, जो व्यक्ति को जन्म से मृत्यु तक संस्कारों के माध्यम से जोड़े रखती है। हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार को मोक्ष प्राप्ति का प्रमुख साधन माना गया है, जहां परिवार के लोग मिलकर दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि देते हैं और उसकी शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। लेकिन जब यही संस्कार विवाद का विषय बन जाए और पारिवारिक विघटन इस हद तक पहुंच जाए कि मृत व्यक्ति के शरीर के भी हिस्से करने की मांग उठने लगे, तो यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी बन जाती है।
टीकमगढ़ जिले के जतारा कस्बे में ऐसी ही एक दुखद और चौंकाने वाली घटना सामने आई, जहां एक बुजुर्ग पिता की मृत्यु के बाद उनके दो बेटों के बीच अंतिम संस्कार को लेकर ऐसा भयानक विवाद हुआ कि बड़ा बेटा पिता के शव को दो टुकड़ों में बांटने की जिद पर अड़ गया। पारिवारिक कलह इस हद तक बढ़ गई कि बुजुर्ग का शव पांच घंटे तक सड़क पर पड़ा रहा और अंततः पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। यह घटना पारिवारिक संबंधों की संवेदनहीनता और सामाजिक मूल्यों के क्षरण का उदाहरण है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पारिवारिक बंटवारे की मानसिकता अब केवल संपत्ति तक सीमित नहीं रही, बल्कि शवों तक भी पहुंच गई है। बुजुर्ग ध्यानी सिंह का निधन और विवाद की शुरुआत
टीकमगढ़ जिले के जतारा में रहने वाले ध्यानी सिंह का रविवार सुबह पांच बजे निधन हो गया। ध्यानी सिंह का परिवार काफी समय से आपसी कलह और संपत्ति विवाद से जूझ रहा था। उनके दो बेटे—किशन सिंह घोष और दामोदर घोष—आपस में पहले ही कई मामलों को लेकर अलग हो चुके थे। लेकिन जब पिता की मृत्यु हुई, तब यह विवाद एक नए और भयावह स्तर पर पहुंच गया।
अंतिम संस्कार की तैयारियों के बीच बड़ा बेटा किशन सिंह इस बात पर अड़ गया कि पिता का शव दो हिस्सों में काटा जाए ताकि दोनों भाई अपने-अपने तरीके से उनका अंतिम संस्कार कर सकें। छोटे भाई दामोदर ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया, लेकिन किशन अपनी जिद पर अड़ा रहा। इस दौरान अंतिम यात्रा में शामिल रिश्तेदारों और ग्रामीणों ने दोनों बेटों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन मामला सुलझने के बजाय और बिगड़ता चला गया।
शव पांच घंटे तक सड़क पर पड़ा रहा
बेटों के बीच बढ़ते विवाद और पिता के शव को बांटने की मांग ने पूरे गांव को स्तब्ध कर दिया। ग्रामीणों ने भी दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की, लेकिन कोई भी अपनी जिद से पीछे हटने को तैयार नहीं था। इसी बीच, घर के बाहर रखा हुआ शव पांच घंटे तक यूं ही पड़ा रहा। यह न केवल मृतक के सम्मान के खिलाफ था, बल्कि पूरे समुदाय के लिए एक अपमानजनक स्थिति थी।
अंततः जब यह मामला ज्यादा बढ़ गया, तो गांव वालों ने जतारा थाना पुलिस को सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुंची और हालात को संभालने की कोशिश की।
पुलिस का हस्तक्षेप और अंतिम संस्कार का समाधान
पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंचकर दोनों भाइयों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन किशन सिंह अपनी मांग पर अड़ा रहा। वह किसी भी कीमत पर अपने पिता के शव को बांटकर अंतिम संस्कार करना चाहता था। पुलिस ने पहले बातचीत से मामला सुलझाने की कोशिश की, लेकिन जब किशन ने जिद नहीं छोड़ी, तो अधिकारियों को सख्ती दिखानी पड़ी।
समझाइश और दबाव के बाद अंततः दोनों भाइयों ने पिता का एक ही स्थान पर अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। पुलिस की मौजूदगी में पूरे विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार संपन्न कराया गया, लेकिन इस घटनाक्रम ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया।
पारिवारिक विघटन और संस्कारों का पतन
भारतीय समाज में पारिवारिक एकता और संस्कारों का विशेष महत्व है। मृत्यु के बाद परिवार के सदस्यों का एक साथ आना और अंतिम संस्कार को विधिपूर्वक संपन्न करना न केवल एक धार्मिक परंपरा है, बल्कि यह मृत आत्मा को सम्मान देने का तरीका भी है। इस घटना ने यह दिखाया कि पारिवारिक संबंधों में दरार इतनी गहरी हो चुकी है कि अब लोग अपने माता-पिता तक को विभाजित करने के लिए तैयार है संपत्ति विवाद और पारिवारिक संघर्ष का दुष्प्रभाव
यह घटना केवल अंतिम संस्कार से जुड़ी नहीं थी, बल्कि इसके पीछे वर्षों से चला आ रहा पारिवारिक संपत्ति विवाद भी था। जब परिवारों में आपसी कलह इस हद तक बढ़ जाती है कि माता-पिता की मृत्यु के बाद भी मनमुटाव जारी रहता है, तो यह सामाजिक विघटन का गंभीर संकेत है।पुलिस का हस्तक्षेप नया सामाजिक चलन?
पुलिस का हस्तक्षेप अब केवल कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पारिवारिक मामलों में भी उसकी भूमिका बढ़ती जा रही है। यह घटना इस बात को रेखांकित करती है कि परिवारों में रिश्तों की कड़वाहट इतनी बढ़ चुकी है कि अंतिम संस्कार तक पुलिस की निगरानी में कराना पड़ रहा है। यह भारतीय समाज के लिए चिंता का विषय है।
इस घटना से हमें कई गंभीर संदेश मिलते हैं:
संस्कार और मूल्यों का ह्रास: यदि परिवार के सदस्य अंतिम संस्कार जैसे पवित्र कर्म को भी विवाद और जिद का विषय बना लें, तो यह समाज में नैतिक पतन का प्रतीक है।
संवाद और सहिष्णुता की कमी: यह विवाद दर्शाता है कि पारिवारिक झगड़ों का समाधान शांति और बातचीत से नहीं निकाला जा रहा, बल्कि जिद और टकराव को ही प्राथमिकता दी जा रही है।
संपत्ति से अधिक महत्वपूर्ण हैं रिश्ते: यदि माता-पिता की मृत्यु के बाद भी संतानें उनकी आत्मा की शांति की बजाय संपत्ति या अन्य विवादों पर ध्यान देती हैं, तो यह एक गंभीर सामाजिक समस्या बन जाती है। इस तरह की घटनाओं में समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने के लिए जागरूकता फैलाए और नैतिक शिक्षा को बढ़ावा दे।
इस घटना ने रिश्तों की ठंडक और सामाजिक मूल्यों की गिरावट को उजागर किया है। अंतिम संस्कार के समय जहां एक परिवार को एकजुट होकर दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि देनी चाहिए, वहां इस तरह का विवाद समाज के लिए एक चेतावनी है। यह आवश्यक है कि हम अपने पारिवारिक मूल्यों को पुनर्जीवित करें और रिश्तों को संपत्ति या अहंकार से ऊपर रखें।
पिता का शव दो हिस्सों में बांटने की जिद केवल एक घटनाक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के लिए एक गंभीर प्रश्न है: क्या हम रिश्तों को केवल अधिकारों और संपत्ति तक सीमित करके देख रहे हैं?

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