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अनसुनी चीखें: एक अधूरी उड़ान

अनसुनी चीखें: एक अधूरी उड़ान



शहडोल का आसमान उस रात बिल्कुल शांत था। रेलवे क्वार्टर के एक छोटे से कमरे में, आरती सनोरिया की दुनिया हमेशा के लिए ठहर गई थी। वह एक सहायक लोको पायलट थी—रेलवे के विशाल इंजन को चलाने वाली, सपनों को नई दिशा देने वाली। लेकिन उस रात, उसकी उड़ान बीच में ही रुक गई। कमरे की दीवारें उसकी अनसुनी चीखों की गवाह थीं, और हवा में अब भी उसके अधूरे सपनों की खुशबू थी।
आरती की कहानी राजस्थान के एक छोटे से गांव से शुरू होती है। बचपन से ही वह कुछ अलग करना चाहती थी—बड़ा सपना देखना और उसे पूरा भी करना। परिवार ने भी उसे खूब प्रोत्साहित किया। कई चुनौतियों से जूझते हुए, उसने रेलवे में सहायक लोको पायलट के रूप में अपनी जगह बनाई। शहडोल में उसकी नई पोस्टिंग हुई थी। एक नई जगह, नए लोग, नया सफर।

वह आत्मनिर्भर थी, मेहनती थी, लेकिन कभी-कभी किस्मत अपने खेल खुद खेलती है। इसी दौरान उसकी ज़िंदगी में आया आशाराम मीणा—रतलाम में पदस्थ एक सहायक स्टेशन मास्टर। आरती ने कभी सोचा भी नहीं था कि जो रिश्ता उसे सहारा देगा, वही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन जाएगा।
शुरुआत में सब कुछ अच्छा था। आशाराम मीणा उसके करियर में दिलचस्पी लेता, उसे गाइड करता। धीरे-धीरे यह रिश्ता भावनाओं से जुड़ने लगा। लेकिन यह रिश्ता एकतरफा था—एक ऐसा बंधन, जहां केवल आरती समझौते कर रही थी।
समय बीतने के साथ, यह प्यार नहीं, एक दबाव बन गया। आशाराम के स्वभाव में संशय, गुस्सा और अधिकार बढ़ता गया। वह आरती को हर चीज़ में नियंत्रित करना चाहता था—किससे बात करनी है, कहां जाना है, यहां तक कि उसके पैसे भी कैसे खर्च होने चाहिए।
धीरे-धीरे यह रिश्ता एक बंद कमरे में कैद होने जैसा लगने लगा। आरती को एहसास होने लगा कि वह इस रिश्ते से बाहर निकलना चाहती है, लेकिन अब यह इतना आसान नहीं था।
29 मार्च 2024 की रात…।
आरती ने कई बार कोशिश की कि वह इस मानसिक प्रताड़ना से बाहर निकले, लेकिन आशाराम मीणा हर बार उसे डराकर, धमकाकर या भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करके वापस खींच लेता।
उस रात आरती अपने कमरे में अकेली थी। वह सहमी हुई थी, टूटी हुई थी, लेकिन सबसे ज्यादा वह खुद से हारी हुई थी। उसने अपनी डायरी निकाली और कुछ आखिरी शब्द लिखे—शायद यह उसकी ज़िंदगी का आखिरी दस्तावेज़ था।
सुबह जब सहकर्मियों ने उसे फोन किया, तो फोन स्विच ऑफ था। फिर मकान मालिक ने खिड़की से देखा… और जो देखा, वह खौफनाक था। आरती फंदे से झूल रही थी।
एक नाम जो संदेहों के घेरे में था”
जब पुलिस पहुंची, तो उन्हें कमरे से एक सुसाइड नोट, कुछ वित्तीय दस्तावेज और आरती का मोबाइल फोन मिला।
सुसाइड नोट पढ़कर सबकी रूह कांप गई—”मैं थक चुकी हूं। मैं अब और नहीं लड़ सकती। मुझे माफ कर देना, पापा।”
उसकी मौत के बाद, परिवारवालों ने आरोप लगाया कि आशाराम मीणा ही इस आत्महत्या के पीछे का कारण है। पुलिस ने कॉल डिटेल्स, मैसेज और अन्य साक्ष्यों को खंगाला। सबकुछ एक ही ओर इशारा कर रहा था—सहायक स्टेशन मास्टर

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