

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हमेशा “पार्टी विद ए डिफरेंस” के रूप में देखा जाता है। अपने आंतरिक लोकतंत्र और संगठनात्मक अनुशासन के दावों के चलते यह पार्टी अन्य दलों से अलग मानी जाती है। लेकिन हाल ही में मध्य प्रदेश में जिलाध्यक्ष चयन प्रक्रिया को लेकर जो गहमागहमी चल रही है, उसने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पार्टी द्वारा जिलाध्यक्षों के चयन के लिए रायशुमारी (सर्वेक्षण) का सहारा लिया गया था, जिसमें विधायकों, मंडल इकाइयों और अन्य वरिष्ठ नेताओं की राय को शामिल किया गया। लेकिन जिस प्रक्रिया को पारदर्शी और लोकतांत्रिक माना जा रहा है वह अब विवादों में घिर गई है। रायशुमारी के बावजूद जिलाध्यक्षों की घोषणा नहीं हो सकी, और निर्णय का दायरा दिल्ली दरबार तक सिमट गया।
रायशुमारी की उपयोगिता पर सवाल
भाजपा में जिलाध्यक्ष चयन की परंपरा में रायशुमारी का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यह प्रक्रिया आमतौर पर जिलों में पूरी होती थी, और रायशुमारी के आधार पर तत्काल घोषणा कर दी जाती थी। लेकिन इस बार मामला उलझ गया है। सवाल यह है कि अगर अंतिम निर्णय केंद्रीय नेतृत्व या बड़े नेताओं को ही करना था, तो रायशुमारी क्यों कराई गई?विधायकों और मंडल इकाइयों का ध्रुवीकरण
रायशुमारी के नाम पर विधायकों और मंडल इकाइयों को अपने-अपने गुटों में बांट दिया गया। प्रत्येक इकाई ने अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को आगे किया, जिससे पार्टी के भीतर गुटबाजी बढ़ी।
रायशुमारी में शीर्ष पर रहने वाले नेताओं का नाम सूची में नहीं दिख रहा है, जबकि जिनका समर्थन नगण्य था, वे शीर्ष दावेदार बनने का दावा कर रहे है ।इससे संगठनात्मक पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। लिफाफों का रहस्य
जिलों से रायशुमारी के लिफाफे भोपाल भेजे गए थे। कार्यकर्ता पूछ रहे हैं कि अगर लिफाफे खोले गए हैं, तो उनके परिणाम सार्वजनिक घोषणा क्यों नहीं
दिल्ली की भूमिका पर सवाल
मध्य प्रदेश में जिलाध्यक्षों का चयन ऐतिहासिक रूप से राज्य नेतृत्व द्वारा किया जाता रहा है। लेकिन इस बार, यह पहली बार है जब पैनल दिल्ली भेजे जाने की बात कही जा रही है और अंतिम निर्णय केंद्रीय नेतृत्व द्वारा किया जा रहा है।
केंद्रीय नेतृत्व की फुर्सत क्या दिल्ली का नेतृत्व अब जिला स्तर के फैसले लेने में भी व्यस्त है? यह स्थिति राज्य नेतृत्व की क्षमता पर सवाल खड़े करती है।
क्या प्रदेश नेतृत्व अपने अधिकार क्षेत्र के फैसले लेने में सक्षम नहीं है? यदि नहीं, तो यह पार्टी के कैडर-बेस्ड सिस्टम के लिए चिंता का विषय है।
भाजपा हमेशा से अपने आंतरिक लोकतंत्र का दावा करती रही है। लेकिन जब जिलाध्यक्ष जैसे बुनियादी निर्णय भी केंद्रीय नेतृत्व द्वारा लिए जाएंगे, तो यह दावे कमजोर पड़ जाते हैं।
रायशुमारी का परिणाम घोषित क्यों नहीं हुआ?

बड़े नेताओं का खेल कयास लगाए जा रहे हैं कि बड़े नेता अपने समर्थकों को व्हाया दिल्ली जिलाध्यक्ष पद तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे गुटबाजी को और बल मिला है। सच क्या है कयास लगाने वाले जाने ।
कार्यकर्ताओं का आक्रोश जिलों में कार्यकर्ता रायशुमारी को पारदर्शिता और निष्पक्षता का प्रतीक मानते हैं। लेकिन जब इस प्रक्रिया को नकारा जायेगा तो उनके मन में नाराजगी पैदा होगी
रायशुमारी की प्रक्रिया बड़े प्रचार के साथ शुरू की गई थी। लेकिन संभावित राजनीतिक परिणाम कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा दिया
जिलाध्यक्ष चयन में पारदर्शिता की कमी से जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित हो सकता है।
गुटबाजी का बढ़ना रायशुमारी के दौरान गुटबाजी स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आई। यदि यह समस्या नहीं सुलझी, तो आगामी चुनावों में यह पार्टी के लिए हानिकारक हो सकती है।
पार्टी की छवि को नुकसान भाजपा के “पार्टी विद ए डिफरेंस” के दावे का क्या होगा
रायशुमारी प्रक्रिया का उद्देश्य लोकतांत्रिक तरीके से जिलाध्यक्षों का चयन करना था। लेकिन इसे जिस तरह नकारा गया, उसने भाजपा के संगठनात्मक ढांचे और आंतरिक लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आने वाले दिनों में जब केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान भोपाल पहुंचेंगे, तो इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय हो सकता है। लेकिन जो स्थिति इस समय बनी हुई है, वह भाजपा जिलाध्ययक्ष दावेदारों के लिए इंतजार के अलावा कुछ नहीं है।
आखिर सवाल है क्या रायशुमारी अब सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गई है? या फिर पार्टी अपने आंतरिक लोकतंत्र की साख को बरकरार रखेगी ।




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