
मध्य प्रदेश भाजपा के जिलाध्यक्षों का चयन अब दिल्ली के हाथों में सौंपा जाना, इस बात का संकेत है कि पार्टी न केवल स्थानीय राजनीति के बारीक समीकरणों से वाकिफ है, बल्कि इसे नियंत्रित करने की ठान चुकी है। दिल्ली ने हर जिले से तीन नामों का पैनल मांगा है, जिसमें एक महिला का नाम अनिवार्य रूप से शामिल होगा। इस निर्णय ने एक तरफ पार्टी के भीतर महिला सशक्तिकरण की दिशा में सकारात्मक कदम का संदेश दिया है, तो दूसरी तरफ जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को नए सिरे से गढ़ने का अवसर भी प्रदान किया है।
क्षत्रियों की दावेदारी बनाम जमीनी हकीकत
अनूपपुर जिले में जातीय समीकरण के नाम पर घमासान छिड़ा हुआ है। एक वरिष्ठ क्षत्रिय भाजपा नेता का इस बात की ओर इशारा करता है कि पार्टी में न केवल जातिगत महत्वाकांक्षाएं बढ़ी हैं, बल्कि इसे लेकर नाराजगी भी स्पष्ट है।
पिछले जिलाध्यक्षों की सूची देखें तो अवधेश ताम्रकार, जय सिंह मरावी, दिलीप जायसवाल, बृजेश गौतम, आधा राम वैश्य और रामदास पुरी जैसे नाम सामने आते हैं। इनमें एक भी क्षत्रिय जिलाध्यक्ष न होना, इस वर्ग की शिकायत को बल देता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह शिकायत वाजिब है, या फिर यह महज राजनीतिक असंतोष का प्रदर्शन है?
अनूपपुर मुख्यालय का तर्क और संगठन की चुनौती
अनूपपुर जिला मुख्यालय के भाजपा नेताओं की यह दलील कि “आज तक मुख्यालय से कोई जिलाध्यक्ष नहीं बना,” इस ओर संकेत करती है कि जिला मुख्यालय को उसकी राजनीतिक पहचान दिलाने में संगठन विफल रहा है। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल यह भी है कि इतने वर्षों में भाजपा कार्यालय का भवन तक क्यों नहीं बन पाया? क्या यह संगठन के भीतर की गुटबाजी और नेतृत्व की कमजोरी का प्रतीक नहीं है?
“धंधा चमकाने” वाले नेता और नए चेहरों की खोज
पुराने नेताओं के तर्क में दम है कि कुछ लोग नेता गिरी को “धंधा चमकाने” का साधन बना चुके हैं। ये वही गिने-चुने चेहरे हैं, जो हर पद और हर अवसर पर अपनी दावेदारी ठोकते हैं। ऐसे नेताओं की महत्वाकांक्षा और धंधों का जाल पार्टी के भीतर न केवल अनुशासनहीनता को बढ़ावा देता है, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं के मनोबल को भी कमजोर करता है।
भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की मंशा स्पष्ट है—जिलाध्यक्ष पद पर किसी ऐसे युवा और नए चेहरे को लाना, जिसने पदों और धंधों का जाल न बिछाया हो। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह मंशा केवल कागजों तक सीमित रहेगी, या इसे जमीन पर भी उतारा जाएगा?
महिलाओं की मजबूत दावेदारी सशक्तिकरण या रणनीति?
महिलाओं की अनिवार्य दावेदारी का प्रावधान न केवल पार्टी की “महिला सशक्तिकरण” की नीति का हिस्सा है, बल्कि यह एक रणनीतिक कदम भी है। अनूपपुर जिले में भी महिलाओं ने अपनी मजबूत दावेदारी पेश की है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि महिलाओं ने अपनी राजनीतिक पहचान को स्थापित करने का मन बना लिया है। लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इनमें से किसी महिला को जिलाध्यक्ष पद का मौका मिलता है, या यह मात्र एक “सांकेतिक कदम” बनकर रह जाता है।
भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा नए चेहरे और युवाओं को प्राथमिकता देने की नीति, भविष्य की राजनीति का स्पष्ट संकेत है। पार्टी ने यह समझ लिया है कि “पुराने घिसे-पिटे चेहरों” से जनता में आकर्षण कम हो रहा है। युवा और नए चेहरों को मौका देना, पार्टी के लिए न केवल एक ताजा शुरुआत होगी, बल्कि यह स्थानीय नेतृत्व को सशक्त करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।
“धंधा चमकाने” वाले नेता, गुटबाजी और पदों की लालसा, यह सब राजनीति के उन पहलुओं को उजागर करते हैं, जिन्हें अक्सर जनता के सामने लाने से बचा जाता है। भाजपा का जिलाध्यक्ष चयन, इन मुद्दों को एक बार फिर से सामने लाने का काम कर रहा है।
अनूपपुर जिले में भाजपा जिलाध्यक्ष चयन पर मचे इस घमासान में जातीय समीकरण, महिला सशक्तिकरण, युवा नेतृत्व और गुटबाजी के मुद्दे गहराई से जुड़े हुए हैं। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का यह निर्णय, इन सभी पहलुओं को एक नई दिशा देने का प्रयास है। लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह प्रयास, केवल “आदेश” बनकर रह जाता है या फिर वास्तव में जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने का काम करता है।
जिला भाजपा के आंतरिक समीकरणों की गहराई को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि राजनीति, आखिरकार, वही खेल है, जहां हर खिलाड़ी अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करता है।




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