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क्या इसी के लिए चुने जाते हैं माननीय? संसद में हंगामा धक्का-मुक्की और राजनीतिक ड्रामा पर उठे सवाल

क्या इसी के लिए चुने जाते हैं माननीय? संसद में हंगामा धक्का-मुक्की और राजनीतिक ड्रामा पर उठे सवाल





देश के नागरिक हर पांच साल में लोकतंत्र के महापर्व में हिस्सा लेते हैं, अपने जनप्रतिनिधियों को संसद में भेजते हैं, ताकि वे जनता की समस्याओं का समाधान करें और देश के विकास में अपना योगदान दें। लेकिन जब संसद में हंगामे, धक्का-मुक्की, और अनियमित व्यवहार की घटनाएं सामने आती हैं, तो यह प्रश्न उठता है कि क्या जनता इन्हें ‘माननीय’ इसी उद्देश्य से चुनती है?
हाल ही में संसद के शीतकालीन सत्र में हुई घटनाओं ने एक बार फिर इस सवाल को प्रासंगिक बना दिया है। धक्का-मुक्की के दौरान सांसद प्रताप सारंगी और मुकेश राजपूत के घायल होने की घटना लोकतांत्रिक मर्यादाओं का ह्रास दर्शाती है। संसद के भीतर हंगामे और संसद परिसर में प्रदर्शन एकत्रित होकर उस गरिमा को चोट पहुंचाते हैं, जिसे लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है।संसद या प्रदर्शन का मंच?
संसद, जो देश की नीतियों और कानूनों पर चर्चा का सर्वोच्च मंच है, अब राजनीतिक प्रदर्शन और शक्ति प्रदर्शन का अड्डा बनता जा रहा है। सांसदों का समय और संसाधन जनता की समस्याओं पर चर्चा करने के बजाय, आरोप-प्रत्यारोप और हंगामे में व्यर्थ हो रहा है।
सांसदों का कर्तव्य
जनता सांसदों को इसलिए चुनती है कि वे उनकी आवाज़ बनें, उनके मुद्दे उठाएं और समाधान सुझाएं। लेकिन जब संसद का उपयोग व्यक्तिगत और पार्टी हितों को साधने के लिए होता है, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को ठेस पहुंचाता है।
जब जनता संसद की कार्यवाही के दौरान हंगामा, अव्यवस्था और असभ्य व्यवहार देखती है, तो वह अपने प्रतिनिधियों से निराश होती है। यह स्थिति उनके विश्वास को कमजोर करती है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी को प्रभावित कर सकती है।
राहुल गांधी पर एफआईआर और बीजेपी द्वारा प्रदर्शन यह दर्शाता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक संघर्ष व्यक्तिगत स्तर तक जा पहुंचा है। विपक्ष इसे “राजनीतिक प्रतिशोध” कहता है, जबकि सत्ता पक्ष इसे “कानून व्यवस्था बनाए रखने” का कदम मानता है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सांसदों को मर्यादा और गरिमा बनाए रखने की हिदायत दी, लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव कितना होगा, यह देखना बाकी है। जब तक राजनीतिक दल अपने आचरण में सुधार नहीं करते, संसद की गरिमा बहाल करना मुश्किल है।
क्या सांसद इसीलिए चुने जाते हैं कि वे संसद में हंगामा करें और जनता के मुद्दों को अनदेखा करें?
क्या धक्का-मुक्की और आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का आदर्श हैं?
जब संसद चलाने में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, तो क्या जनता के पैसों का उपयोग इस तरह होना चाहिए?
संसद की गरिमा और कार्यक्षमता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि सभी दल आत्मनिरीक्षण करें और संसद में जिम्मेदारी से आचरण करें। संसद के अंदर और बाहर प्रदर्शन और हंगामे से अधिक जरूरी है जनता की समस्याओं पर चर्चा करना।
सांसदों को आचार संहिता का पालन करना होगा।
सत्ता पक्ष और विपक्ष को संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की दिशा में कदम उठाने चाहिए।
जनता को भी जागरूक होकर अपने प्रतिनिधियों से जवाबदेही मांगनी चाहिए
संसद देश के लोकतंत्र का मंदिर है, और सांसद इस मंदिर के पुजारी। जब पुजारी ही मर्यादाओं को भंग करेंगे, तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होगी। जनता अपने ‘माननीयों’ को उनके कर्मों से आंकती है, न कि उनके भाषणों और नारों से। इसलिए समय आ गया है कि सांसद खुद से पूछें: “क्या मैं अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार हूं?”

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Kailash Pandey
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