

भोपाल गैस त्रासदी का जहरीला कचरा नष्ट करने की तैयारी पीथमपुर में होगा निष्पादन, 126 करोड़ की लागत से उठे सवाल और चिंताए
भोपाल गैस त्रासदी के करीब 40 वर्षों बाद, यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में जमा 337 मीट्रिक टन जहरीले कचरे को नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। उच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार, यह कार्य 6 जनवरी से पहले प्रारंभ किया जाएगा।
भोपाल गैस त्रासदी के दौरान फैले जहरीले रसायनों ने हजारों लोगों की जान ली थी और फैक्ट्री में बचा यह कचरा आज भी पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है। दशकों से इस कचरे के कारण आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण की समस्या बनी हुई है।
इस जहरीले कचरे को मध्य प्रदेश के धार जिले के पीथमपुर स्थित औद्योगिक कचरा प्रबंधन इकाई (PIWMC) में सुरक्षित तरीके से जलाया जाएगा। इस प्रक्रिया में अत्याधुनिक इंसीनेरेशन तकनीक का प्रयोग किया जाएगा। प्रति किलो कचरे को नष्ट करने की लागत ₹3,740 निर्धारित की गई है। कुल 337 टन कचरे के निपटान में 126 करोड़ रुपये का खर्च आएगा, जो केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाएगा।
भोपाल और आसपास के क्षेत्रों में दशकों से यह जहरीला कचरा गंभीर बीमारियों और प्रदूषण का कारण बन रहा था। इस कचरे के निपटान से पर्यावरणीय खतरे और स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभावों को कम करने की कोशिश की जा रही है।
इस पूरे मामले को लेकर जबलपुर उच्च न्यायालय ने सख्त निर्देश दिए हैं कि निपटान प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू हो। सरकार और संबंधित विभागों ने प्रक्रिया की तैयारियाँ पूरी कर ली हैं। वहीं, पीथमपुर के स्थानीय निवासी इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि जहरीले कचरे को जलाने से क्षेत्र में वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य पर खतरा बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जहरीले कचरे के निपटान के लिए भारत में उच्चतम स्तर की इंसीनेरेशन तकनीक अभी सीमित है। इसलिए यह प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता और सुरक्षा मानकों के साथ होना आवश्यक है।
भोपाल और उसके आसपास के क्षेत्रों में दशकों से बने पर्यावरणीय खतरे को समाप्त किया जाएगा।
जहरीले कचरे से फैल रहे स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को नियंत्रित किया जा सकेगा।
पीथमपुर और आसपास के गाँवों के निवासियों के लिए यह प्रक्रिया चिंता का विषय है। जहरीली गैसों के रिसाव और प्रदूषण की आशंका बनी हुई है।
इतने बड़े खर्च के बावजूद, यदि प्रक्रिया में तकनीकी खामी रही तो इसका विपरीत असर हो सकता है।
भोपाल गैस त्रासदी के जहरीले कचरे के निपटान का यह प्रयास एक ऐतिहासिक कदम है, लेकिन इसकी सफलता पर्यावरणीय मानकों के सख्त अनुपालन पर निर्भर करती है। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि निपटान प्रक्रिया से किसी नए संकट की शुरुआत न हो और प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को विश्वास में लेकर पूरी पारदर्शिता के साथ यह कार्य संपन्न हो।





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