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मृत्यु के नीचे छिपी ज़िंदगी

मृत्यु के नीचे छिपी ज़िंदगी

मिश्र की मार्मिक कहानी
प्राचीन मिस्र के निर्जन रेगिस्तान में एक ऐसा रहस्यमयी आश्रम था, जहां आत्मा और शरीर के बीच की गहराई को नापने का प्रयास होता था। यह आश्रम अपने आप में एक भूलभुलैया था—सतह पर तपस्वियों का शांति से भरा जीवन, और नीचे धरती की परतों के भीतर एक गहरी, भयावह कब्रगाह।


यह कब्रगाह हज़ारों साल पुरानी थी। इसे पत्थरों से बंद कर दिया गया था ताकि मृत आत्माएं किसी को परेशान न करें। परंपरा के अनुसार, जब कोई भिक्षु मरता, तो उसकी देह को नीचे बने इस भयानक अंधकार में डाल दिया जाता। हर बार जब यह होता, तो जीवन और मृत्यु का चक्र अपना कार्य पूरा करता—या ऐसा माना जाता

भूल की शुरुआत

एक दिन, एक भिक्षु को मृत समझकर कब्रगाह में डाल दिया गया। पर वह वास्तव में मरा नहीं था। वह केवल गहरे ध्यान में था—इतना गहरा कि उसकी सांसें धीमी पड़ चुकी थीं। जब उसे नीचे गिराया गया और पत्थरों की विशाल चट्टान उसके ऊपर बंद कर दी गई, तो कुछ घंटों बाद उसकी चेतना लौटी।

उसने अपनी आँखें खोलीं, और जो दृश्य उसके सामने था, वह किसी भी इंसान की कल्पना से परे था। चारों ओर सिर्फ सड़ी हुई लाशें, हड्डियां, दुर्गंध और अंधेरा। उसकी सांस घुटने लगी। उसने चिल्लाने की कोशिश की, लेकिन उसे पता था कि उसकी आवाज़ इस ठोस पत्थर को नहीं भेद सकेगी।

मृत्यु से साक्षात्कार

उसने हरसंभव कोशिश की, पर समय बीतता गया। धीरे-धीरे, उसे समझ आया कि इस नरक से बचने का कोई रास्ता नहीं है। परंतु उसकी आत्मा में जीने की इच्छा अब भी थी।

पहले दिन उसने भूख और प्यास से लड़ाई की। दूसरे दिन, जब उसका शरीर टूटने लगा, उसने दीवार से टपकने वाले गंदे पानी को चाट कर अपनी प्यास बुझाई। तीसरे दिन, उसने लाशों पर पलने वाले कीड़ों को खाना शुरू कर दिया। यह विचार भयानक था, पर जीने की इच्छा भयानक विचारों से भी अधिक प्रबल थी।

वह हर गुजरते दिन के साथ अपने भीतर एक नया बल पाता। उसने लाशों के कपड़े इकट्ठा किए, उनके पास रखे आभूषण और सिक्कों को संभाल कर रखा। उसका मन कहता, “कभी न कभी यह द्वार खुलेगा। और जब खुलेगा, तो मैं सिर्फ जीवित नहीं बल्कि विजयी बनकर बाहर निकलूंगा।”

सात साल का अंधकार

सात साल! वह भिक्षु उन सड़ते शवों के बीच ज़िंदा रहा। उसने अपनी जीने की कला में महारथ हासिल कर ली। उसका शरीर तो कब का टूट चुका था, लेकिन उसकी आत्मा ने उसे थामे रखा।

इन सात वर्षों में, वह समय का हर एहसास खो चुका था। उसके बाल इतने बढ़ गए थे कि वे जमीन को छूने लगे थे। उसकी आंखें इतनी धुंधली हो गईं कि पलकें खोलना मुश्किल था। लेकिन वह हर दिन जीने के लिए एक नया कारण खोजता।

द्वार खुला, पर एक नयी दुनिया का आगमन

सात साल बाद, आश्रम में एक और भिक्षु की मृत्यु हुई। जब द्वार खोला गया, तो वहां इकट्ठा हुए लोग चौंक गए। कब्रगाह से एक भूत जैसी आकृति निकली। उसके शरीर पर सड़े हुए कपड़े थे, हाथ में एक पोटली थी जिसमें लाशों से लूटे गए सिक्के और गहने थे।

लोगों ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। कुछ ने डरकर भागने की कोशिश की। उसने कांपती आवाज़ में कहा, “मैं वही हूं जिसे सात साल पहले तुमने मृत समझकर नीचे डाल दिया था।”

लोग भय और विस्मय में कांपते हुए रुके। उन्होंने पूछा, “तुम जिंदा कैसे बचे?”

उसने जवाब दिया, “जीने के लिए मैंने जो किया, वह मेरी आत्मा को भी डराता है। लेकिन मरना इतना आसान नहीं होता। मैंने हर पल खुद को मरा हुआ मानने से इनकार किया।

उस भिक्षु की कहानी ने पूरे आश्रम को हिला कर रख दिया। उसने कहा, “जिसे तुम जीवन कहते हो, वह भी एक बड़ा कब्रिस्तान है। यहाँ भी हम उन चीज़ों से जीते हैं जो किसी और की हैं। हमारा भोजन, हमारे कपड़े, हमारी इच्छाएं—सब उधार की हैं। और फिर भी हम जीने के लिए संघर्ष करते हैं, उम्मीद करते हैं कि कल कुछ बेहतर होगा।”

उसने अपनी अंतिम बात कही, “मृत्यु से भागने की कोशिश मत करो। बल्कि उसे समझो, उसका सामना करो। क्योंकि जब तुम मृत्यु को समझ लेते हो, तब ही जीवन का सही अर्थ जान पाते हो।

वह भिक्षु एक जीवित किंवदंती बन गया। लेकिन उसकी कहानी ने प्रश्न छोड़ दिया  क्या मृत्यु के गर्भ में जीवन है।

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Kailash Pandey
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(M.P.)

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