Globe’s most trusted news site

वन विभाग मध्यप्रदेश का सियासी अखाड़ा, सत्ता समीकरण और मंत्री बदलने का खेल

वन विभाग मध्यप्रदेश का सियासी अखाड़ा, सत्ता समीकरण और मंत्री बदलने का खेल



मध्यप्रदेश में सत्ता के गलियारों में वन विभाग ऐसा मंत्रालय बन गया है, जहां मंत्री बदलने की परंपरा ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा रखी है। एक वर्ष में तीसरे वन मंत्री की संभावनाओं ने प्रदेश की राजनीति में सत्ता और रणनीति के नए आयाम खोले हैं। नगर सिंह चौहान से लेकर रामनिवास रावत और अब संभावित नए मंत्री तक, यह बदलाव केवल मंत्रालय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में राजनीतिक समीकरण, दल बदल की रणनीति और आगामी चुनावी मंसूबे भी हैं।

मध्यप्रदेश की सियासत में वन विभाग का महत्व

वन विभाग केवल एक प्रशासनिक मंत्रालय नहीं है। मध्यप्रदेश, जिसे “हरित प्रदेश” भी कहा जाता है, वन क्षेत्र में देश में अग्रणी स्थान रखता है। विभाग पर राज्य की वन संपदा, पर्यावरण संरक्षण, और आदिवासी इलाकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुधारने की जिम्मेदारी है।

राजनीतिक दृष्टि से, यह विभाग सत्ता के समीकरण साधने और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में राजनीतिक संतुलन बनाने के लिए इस्तेमाल होता रहा है। वन विभाग आदिवासी बहुल क्षेत्रों में प्रभावी है, और इन क्षेत्रों का वोटबैंक विधानसभा और लोकसभा चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाता है। ऐसे में वन मंत्री का चयन केवल एक नियुक्ति नहीं, बल्कि एक रणनीतिक निर्णय होता है।

रामनिवास रावत की नियुक्ति और इस्तीफा एक समीकरण की कहानी

रामनिवास रावत, जो कांग्रेस के छह बार के विधायक और मंत्री रह चुके हैं, भाजपा में शामिल होकर वन मंत्री बनाए गए थे। यह कदम भाजपा की रणनीति का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य श्योपुर और विजयपुर जैसे कांग्रेस के मजबूत गढ़ों में सेंध लगाना था। लोकसभा चुनाव के दौरान उनकी भूमिका पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हुई, लेकिन उनके विधानसभा उपचुनाव हारने के बाद समीकरण बदल गए।


रावत की हार का स्पष्ट संदेश था कि मतदाता दल बदलने वालों को लेकर सहानुभूति नहीं रखते। विजयपुर के मतदाताओं ने स्पष्ट कर दिया कि “दल आपने बदला है, हमने नहीं।” इससे भाजपा को यह सीख मिली कि दलबदल के जरिए चुनावी गणित साधने की रणनीति हर जगह काम नहीं करती।

दलबदल और वन विभाग का खेल

वन विभाग की कुर्सी पिछले एक साल से सियासी अस्थिरता का शिकार रही है। नगर सिंह चौहान को पहले वन मंत्री बनाया गया, लेकिन कुछ विवादों और प्रशासनिक विफलताओं के चलते उनसे विभाग छीन लिया गया। इसके बाद रावत को विभाग सौंपा गया, लेकिन अब उनके इस्तीफे के बाद यह कुर्सी फिर खाली हो गई है।

दलबदल के जरिए सत्ता में आई भाजपा सरकार ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि विपक्ष के बड़े चेहरे को अपने पाले में लाकर चुनावी लाभ लिया जाए। हालांकि, श्योपुर में भाजपा की यह रणनीति उलटी पड़ गई। अब सवाल उठता है कि क्या वन मंत्रालय फिर से राजनीतिक प्रयोगशाला बनेगा, या इस बार मुख्यमंत्री मोहन यादव इसे स्थायित्व देंगे।

मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ उन्हें नया वन मंत्री नियुक्त करना है, तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर वन मंत्रालय को लेकर जारी गुटबाजी और दावेदारी को भी संतुलित करना है।

संभावित उम्मीदवार और उनके राजनीतिक समीकरण
रमाकांत भार्गव
बुधनी से शिवराज सिंह चौहान के करीबी माने जाने वाले रमाकांत भार्गव को वन मंत्री बनाया जा सकता है। हालांकि, उनकी सीट से जीत का अंतर कम होने के कारण यह निर्णय विवाद का कारण बन सकता है।
अजय विश्नोई
वरिष्ठ और अनुभवी नेता अजय विश्नोई की दावेदारी भी मजबूत मानी जा रही है। लेकिन उनके पिछले रिकॉर्ड और विवादों के चलते पार्टी सतर्क है।
आदिवासी चेहरा
आदिवासी बहुल क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री किसी नए और युवा आदिवासी नेता को मौका दे सकते हैं। यह कदम आदिवासी समुदाय के बीच भाजपा की पकड़ मजबूत करने की दिशा में होगा।

वन विभाग और आगामी चुनावी रणनीति
विधानसभा चुनाव और उसके बाद के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा वन विभाग का इस्तेमाल आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में अपना वोटबैंक मजबूत करने के लिए कर सकती है। वन विभाग को आदिवासी कल्याण योजनाओं और रोजगार सृजन कार्यक्रमों का केंद्र बनाकर भाजपा अपने विरोधियों को मात देने की कोशिश करेगी।

दलबदल के जरिए अपने नेता खोने वाली कांग्रेस, भाजपा पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ रही। रामनिवास रावत की हार कांग्रेस के लिए राजनीतिक संदेश है कि वह क्षेत्रीय मुद्दों और स्थानीय नेताओं की ताकत के साथ मैदान में उतरे।

वन विभाग की स्थिति पर सियासी हलकों में व्यंग्य भी कम नहीं हो रहा है। इसे “कुर्सी का वनवास” कहा जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि वन विभाग अब प्रशासनिक काम से ज्यादा सियासी प्रयोगों का शिकार हो गया है।

वन विभाग में बार-बार हो रहे मंत्री बदलाव से यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह विभाग सियासी जोड़-तोड़ का केंद्र बनकर अपनी मूल जिम्मेदारियों से भटक गया है।

मध्यप्रदेश का वन विभाग केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं है; यह राज्य की राजनीति और सत्ता के समीकरणों का केंद्र बन चुका है। एक साल में तीसरे वन मंत्री की संभावनाएं न केवल प्रशासनिक अस्थिरता को दर्शाती हैं, बल्कि यह भी संकेत देती हैं कि सियासी महत्वाकांक्षाएं विकास पर भारी पड़ रही हैं।

मुख्यमंत्री मोहन यादव के पास वन विभाग को स्थिरता देने और इसे सियासी अखाड़े से निकालकर वास्तविक विकास का जरिया बनाने का मौका है। अगर यह अवसर गंवाया गया, तो विभाग केवल राजनीतिक जोड़-तोड़ का एक और उदाहरण बनकर रह जाएगा।

Tags

Leave a Reply

Ad with us

Contact us : admin@000miles.com

Admin

Kailash Pandey
Anuppur
(M.P.)

Categories

error: Content is protected !!