निर्वाचन नियमों की व्याख्या में उलझा स्टेट बार चुनाव, वकीलों ने खोला मोर्चा

जबलपुर। मध्यप्रदेश स्टेट बार काउंसिल के चुनाव प्रक्रिया शुरू होते ही विवादों के घेरे में आ गई है। जबलपुर में चुनाव समिति द्वारा 12 प्रत्याशियों के नामांकन पत्र निरस्त किए जाने के बाद वकीलों में गहरा रोष व्याप्त है। नामांकन रद्द होने का मुख्य कारण प्रत्याशियों का किसी अन्य बार एसोसिएशन में पदाधिकारी होना बताया गया है। इस निर्णय को नियम विरुद्ध बताते हुए प्रभावित प्रत्याशियों ने अब देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है, जिस पर आगामी सोमवार को सुनवाई होना तय है।

​वर्तमान पदाधिकारियों और चुनाव समिति पर गंभीर आरोप

​हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डीके जैन ने वर्तमान परिस्थितियों पर अपनी बात रखते हुए कहा कि चुनाव समिति स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने के बजाय स्टेट बार के वर्तमान पदाधिकारियों के प्रभाव में काम कर रही है। उनके अनुसार मतदाता सूची में भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई है, जहां हजारों अधिवक्ताओं के नाम काट दिए गए और उनमें सुधार के लिए पर्याप्त समय भी उपलब्ध नहीं कराया गया। इस पूरी प्रक्रिया को लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत बताया जा रहा है।

​नियमों की व्याख्या और विरोधाभासी निर्णय

​हाई कोर्ट बार के सचिव परितोष त्रिवेदी ने नामांकन प्रक्रिया की विसंगतियों को उजागर करते हुए बताया कि आवेदन फॉर्म में स्पष्ट रूप से यह वचन पत्र लिया गया था कि चुनाव जीतने की स्थिति में प्रत्याशी को अपने वर्तमान पद से त्यागपत्र देना होगा। इस अंडरटेकिंग के बाद भी नामांकन निरस्त करना समझ से परे है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को पुराने नियमों में संशोधन के लिए एक सप्ताह की मोहलत दी थी, लेकिन उस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। इसी तरह जिला बार अध्यक्ष मनीष मिश्रा और उपाध्यक्ष ज्योति राय ने भी समिति की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।

​आर्थिक विसंगतियां और मानदेय का मुद्दा

​निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान आर्थिक पहलुओं पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। पदाधिकारियों ने जानकारी दी कि चुनाव समिति में शामिल पूर्व मुख्य न्यायाधीश, सेवानिवृत्त जज और वरिष्ठ अधिवक्ताओं को भारी-भरकम मानदेय दिया जा रहा है। इसमें प्रतिमाह क्रमशः 4.5 लाख, 3.5 लाख और 2.5 लाख रुपए की राशि निर्धारित है। नामांकन फॉर्म की कीमत भी 5000 रुपए रखी गई थी और सवा लाख रुपए की नामांकन फीस वापसी को लेकर भी समिति के बयानों में विरोधाभास देखा गया है। इन तमाम मुद्दों को लेकर अब समिति के इस्तीफे की मांग तेज हो गई है।

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