हाईकोर्ट ने उमरिया एसडीओ का आदेश किया शून्य, नए सिरे से होगी सुनवाई

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सीमांकन विवाद में उमरिया एसडीओ का आदेश किया निरस्त

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राजस्व प्रकरणों में समयसीमा की अनदेखी पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने सीमांकन से जुड़े एक पुराने विवाद में उमरिया के एसडीओ द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें 5 वर्ष की लंबी देरी को बिना किसी ठोस आधार के महज दो पंक्तियों में माफ कर दिया गया था। जस्टिस विवेक जैन की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि न्यायिक और अर्ध-न्यायिक प्रक्रियाओं में वैधानिक समयसीमा का पालन अनिवार्य है और इसे केवल औपचारिक आदेशों के जरिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

​समयसीमा की वैधता और न्यायिक प्रक्रिया

​न्यायालय ने रेखांकित किया कि राजस्व मामलों में अपील दायर करने के लिए 45 दिन की समयसीमा निर्धारित है। इस मामले में 5 साल के अंतराल के बाद अपील स्वीकार की गई थी। हाईकोर्ट के अनुसार इतनी लंबी अवधि के विलंब को बिना किसी तार्किक और पर्याप्त कारण के स्वीकार करना विधि विरुद्ध है। पीठ ने टिप्पणी की कि केवल दो लाइनों का संक्षिप्त आदेश जारी कर कानून के स्थापित सिद्धांतों की अनदेखी की गई है। राजस्व अधिकारियों को विलंब माफी के आवेदनों पर विचार करते समय गुण-दोष और तथ्यों का विस्तृत विवरण देना आवश्यक है।

​उमरिया जिले का भूमि विवाद

​यह पूरा प्रकरण उमरिया जिले के पाली क्षेत्र का है। यहां की निवासी कमला जायसवाल की भूमि का सीमांकन 8 मई 2018 को राजस्व निरीक्षक द्वारा किया गया था। उस समय इस सीमांकन रिपोर्ट को आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर लिया गया था। लगभग 6 वर्ष बीतने के बाद वर्ष 2024 में पड़ोसी पक्ष रामचंद्र जायसवाल और अन्य ने इस सीमांकन को एसडीओ के समक्ष चुनौती दी। एसडीओ ने 20 नवंबर 2024 को पुराने सीमांकन को निरस्त करने का निर्णय लिया। इस आदेश के विरुद्ध याचिकाकर्ता ने पहले एडिशनल कलेक्टर का दरवाजा खटखटाया और वहां से राहत न मिलने पर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।

​हाईकोर्ट का निर्देश और पुनर्विचार

​याचिकाकर्ता के अधिवक्ता कपिल शर्मा ने दलील दी कि एसडीओ का आदेश प्रशासनिक प्रक्रिया का उल्लंघन है क्योंकि इसमें विलंब के कारणों का उल्लेख नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने इन तर्कों से सहमत होते हुए एसडीओ के आदेश को अवैध माना और उसे निरस्त कर दिया। अदालत ने अब इस मामले को वापस एसडीओ कार्यालय भेजने के निर्देश दिए हैं। उच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि एसडीओ अब नए सिरे से विलंब माफी के आवेदन पर सुनवाई करें और तथ्यों के आधार पर तर्कसंगत निर्णय लें। इस फैसले से साफ हो गया है कि राजस्व अधिकारी अपनी शक्तियों का प्रयोग करते समय समयसीमा के नियमों को हल्के में नहीं ले सकते।

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