जबलपुर सहित पूरे मध्यप्रदेश के कृषि परिदृश्य में इस वर्ष एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। प्रदेश सरकार ने ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती से पैदा हो रही चुनौतियों और गिरती गुणवत्ता को देखते हुए अपनी नीति में परिवर्तन किया है। अब सरकार का पूरा ध्यान मूंग के स्थान पर उड़द की खेती को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। इसका मुख्य कारण मूंग की फसल में कीटनाशकों का अनियंत्रित उपयोग और उससे सेहत पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव हैं। कृषि विभाग अब किसानों को उड़द की बुआई के लिए बड़े पैमाने पर प्रेरित कर रहा है ताकि कृषि पारिस्थितिकी और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाया जा सके।

​कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से मूंग की गुणवत्ता में गिरावट

​प्रदेश में समर्थन मूल्य पर बेहतर दाम मिलने की वजह से किसानों ने मूंग के उत्पादन को अपनी आय का मुख्य जरिया बना लिया था। कम समय में ज्यादा पैदावार लेने और लागत को नियंत्रित करने के फेर में किसानों ने बड़े पैमाने पर रासायनिक कीटनाशकों का सहारा लिया। आमतौर पर 55 से 60 दिन में तैयार होने वाली मूंग की फसल में हर सप्ताह कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव किया गया। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रक्रिया ने मूंग को जहरीला बना दिया और उसकी प्राकृतिक गुणवत्ता पूरी तरह समाप्त हो गई। अत्यधिक रसायनों के कारण यह फसल मानवीय उपभोग के लिए असुरक्षित श्रेणी में आने लगी, जिससे बाजार में इसकी मांग और साख दोनों पर बुरा असर पड़ा है।

​सरकार ने बनाई मूंग खरीदी से दूरी और उड़द पर फोकस

​मूंग की गिरती गुणवत्ता और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण इस बार प्रदेश सरकार ने समर्थन मूल्य पर इसकी खरीदी से पीछे हटने का निर्णय लिया है। सरकार अब मूंग की बजाए उड़द की सरकारी खरीदी को प्राथमिकता देगी। गेहूं की कटाई के बाद खाली होने वाले खेतों में मूंग लगाने के बजाय किसानों को उड़द लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। कृषि विभाग के माध्यम से सरकार किसानों को यह समझाने का प्रयास कर रही है कि उड़द की खेती न केवल सुरक्षित है बल्कि यह आर्थिक रूप से भी अधिक लाभदायक साबित हो सकती है। सरकारी स्तर पर लिए गए इस फैसले का उद्देश्य कृषि उत्पादों की शुद्धता सुनिश्चित करना है।

​किसानों के लिए 600 रुपये बोनस की विशेष घोषणा

​उड़द की खेती की ओर किसानों का रुझान बढ़ाने के लिए सरकार ने वित्तीय प्रोत्साहन का सहारा लिया है। इस बार उड़द के निर्धारित समर्थन मूल्य के साथ 600 रुपये प्रति क्विंटल का अतिरिक्त बोनस देने का वादा किया गया है। यह कदम किसानों को मूंग के मोह से बाहर निकालने और उड़द की बुआई के लिए आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा है। कृषि अधिकारियों का मानना है कि अतिरिक्त बोनस और उड़द में लगने वाली कम लागत के कारण किसानों को प्रति एकड़ अधिक मुनाफा होगा। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और उन्हें बाजार के उतार-चढ़ाव से भी सुरक्षा मिलेगी।

​जबलपुर में उड़द का रकबा बढ़ाने का नया लक्ष्य

​जबलपुर जिले में कृषि के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्तमान में मूंग का रकबा लगभग 50 हजार हेक्टेयर है, जबकि उड़द की खेती 40 से 45 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में की जा रही है। कृषि विभाग ने इस बार विशेष कार्ययोजना तैयार की है जिसके तहत उड़द के रकबे को बढ़ाकर 60 से 70 हजार हेक्टेयर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके विपरीत मूंग के रकबे में बड़ी गिरावट आने की संभावना है। विभाग की टीमें गांव-गांव जाकर किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन दे रही हैं और उन्हें उन्नत किस्म के उड़द के बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने में मदद कर रही हैं ताकि उत्पादन लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।

​मृदा स्वास्थ्य और फसल चक्र का महत्व

​जबलपुर के कृषि विश्वविद्यालय के मृदा विशेषज्ञ डॉ. शेखर सिंह बघेल का मानना है कि मूंग मूल रूप से खरीफ की फसल है जिसे किसान अधिक लाभ के चक्कर में गर्मी के मौसम में उगा रहे हैं। बेमौसम की फसल होने के कारण इसमें कीटों का हमला अधिक होता है जिससे निपटने के लिए किसान अंधाधुंध कीटनाशक डालते हैं। इसके मुकाबले उड़द की फसल में कीटनाशकों की जरूरत कम पड़ती है और इसकी फसल अवधि भी संतुलित रहती है। डॉ. बघेल के अनुसार किसानों को फसल चक्र अपनाना चाहिए और ऐसी फसलों का चुनाव करना चाहिए जो मिट्टी की उर्वरता बनाए रखें। उड़द की खेती से मिट्टी में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है जिससे भूमि की सेहत भी सुधरती है।

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