
कक्का की चौपाल
शाम होते ही गाँव की चौपाल फिर जीवित हो उठती है। पीपल के पुराने पेड़ की छाया लंबी होने लगती है और मिट्टी की खटिया पर बैठे कक्का अपनी सफ़ेद गमछी सँभालते हुए चाय की चुसकी लेते हैं। सामने बैठे लोग जानते हैं—आज की चर्चा फिर किसी न किसी की निंदा से शुरू होगी और शायद आत्ममंथन पर खत्म।
कक्का अक्सर कहते हैं
“इस ज़माने में निंदा कोई बुरी आदत नहीं, बल्कि ज़िंदा होने का प्रमाण है।
जो कुछ करता है, वही बदनाम होता है।
जो चुप रहता है, वही सुरक्षित रहता है—क्योंकि वह दिखता ही नहीं।”
यह बात सुनकर लोग मुस्कुराते हैं, लेकिन सच्चाई यही है। आज के समाज में सक्रिय होना अपने आप में जोखिम है। आप कुछ करें तो सवाल, और सवालों का जवाब दें तो गालियाँ। न बोलें तो भी दोषी, और बोलें तो भी।
कक्का बताते हैं कि पहले निंदक समाज का आईना होता था। उसकी बातों में कटुता ज़रूर होती थी, लेकिन उसमें सुधार की गुंजाइश भी रहती थी। आज का निंदक आईना नहीं, कैमरा लेकर चलता है। वह सच खोजने नहीं, दृश्य बनाने निकला है। बिना पानी और बिना साबुन सबको धो देने का दावा करता है, लेकिन खुद कब नहाया—यह पूछते ही नेटवर्क चला जाता है।
आज निंदा व्यक्तिगत व्यवहार नहीं, बल्कि संगठित कारोबार बन चुकी है। कक्का इसे हँसते हुए नाम देते हैं—“निंदा प्राइवेट लिमिटेड।”
इसके ब्रांड एंबेसडर ट्रोल हैं, मार्केटिंग अफ़वाह से होती है और उत्पाद किसी की प्रतिष्ठा। हर दिन एक नया ‘बड़ा खुलासा’ आता है, और हर खुलासा ‘सूत्रों के हवाले से’। सूत्र इतने बदनाम हो चुके हैं कि अगर नल से पानी न आए, तो लोग पूछने लगते हैं कौन सा सूत्र था?
कक्का का मानना है कि आज सबसे आसान काम है दूसरों को चोर कहना। समाज, व्यवस्था, सिस्टम—सब चोर हैं। लेकिन ये आरोप लगाने वाले अक्सर सबसे बड़े नैतिकता के ठेकेदार होते हैं। हाथ में माइक होता है, जेब में अंधा चश्मा और गिरेबान में झाँकने से इन्हें एलर्जी होती है। दूसरों की गलती इन्हें पहाड़ लगती है और अपनी गलती धूल जो दिखती ही नहीं।
जब पकड़े जाते हैं, तो बचाव का एक ही वाक्य होता है
“हम तो बस सवाल पूछ रहे थे।”
यहीं कक्का का सबसे अहम सवाल खड़ा होता है—क्या सवाल पूछने वालों से भी सवाल नहीं होने चाहिए?
अगर कोई पूछे कि तुमने यह क्यों किया, तो उससे पूछा जाना चाहिए—तुमने खुद क्या किया?
अगर कोई समाज को चोर कहे, तो उससे पूछा जाना चाहिए यह सुविधाएँ तुम्हे कैसे मिली ?
क्योंकि सवाल वही ईमानदार है, जो आईने के सामने खड़े होकर भी पूछा जा सके।
कक्का यह भी कहते हैं कि अच्छे काम की कद्र इस समाज में अक्सर देर से होती है। ज़िंदा रहते व्यक्ति विवादित, जुगाड़ू या ओवरएक्टिव कहलाता है। मरने के बाद वही व्यक्ति अचानक “बहुत ईमानदार” बन जाता है। कक्का मुस्कुराकर कहते हैं प्रशंसा भी एक सरकारी योजना है, जिसकी डिलीवरी मृत्यु के बाद होती है।
लोगों की बातों को दिल पर लेने की आदत पर कक्का सख़्त हैं। वे कहते हैं—दिल को हार्ट रहने दो, हार्ड डिस्क मत बनाओ। हर टिप्पणी, हर कमेंट अगर दिल में सेव कर लोगे, तो ज़िंदगी हैंग हो जाएगी। आज के दौर में मानसिक शांति सबसे महँगी चीज़ है और मुफ्त की निंदा सबसे सस्ती।
सोशल मीडिया को लेकर कक्का की आवाज और तीखी हो जाती है। उनके अनुसार आज हर आदमी पहलवान है और हर पोस्ट दंगल। तथ्य कमजोर हों तो कैप्शन काम आता है। और सबसे ख़तरनाक वाक्य वही है “मैं तो बस सवाल पूछ रहा हूँ।”
शाम गहराने लगती है, चाय ठंडी होने को है और चौपाल धीरे-धीरे खाली होने लगती है। जाते-जाते कक्का बस इतना कहते हैं
निंदा से डरिए मत,
प्रशंसा की भीख मत माँगिए।
ईमानदारी से काम कीजिए और जो आपसे सवाल पूछे, उससे सवाल पूछने का साहस रखिए।
क्योंकि आज के दौर में सच के साथ खड़ा रहना ही ज़िंदा होने का सबसे बड़ा सबूत है।



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