जनता जवाबदेह है, तो सरकार क्यों नहीं?

जब किसी राष्ट्र की सड़कों पर नागरिक को एक-एक नियम का पालन न करने पर हजारों रुपये का जुर्माना भरना पड़े और उसी राष्ट्र की सड़कों पर शासन-प्रशासन की चूक पर कोई जवाबदेह न हो, तो यह चिंता का विषय नहीं, जनतंत्र पर आघात है।
आज भारत के शहरों और कस्बों में सख्त ट्रैफिक नियमों की सराहना करने की ज़रूरत है, लेकिन उससे पहले यह सवाल पूछने की हिम्मत भी करनी होगी—क्या ये नियम और दंड केवल जनता के लिए हैं?
बिना हेलमेट 1000 रुपये का जुर्माना।
बीमा नहीं है तो 1000 रुपये।
नो पार्किंग में खड़ी गाड़ी के लिए 3000 रुपये।
मोबाइल पर बात करते पकड़े गए तो 2000 रुपये।
शराब पीकर वाहन चलाया तो 10,000 रुपये का चालान।
इन सभी नियमों का पालन करना ज़रूरी है, क्योंकि ये हमारी और दूसरों की सुरक्षा से जुड़े हैं। परंतु सवाल यह है कि जब वही नागरिक खराब सड़कों पर गिरकर घायल होता है, जब ट्रैफिक सिग्नल काम नहीं करता, जब अंधेरी सड़कों पर हादसे होते हैं, जब आवारा मवेशियों से टकराकर जान जाती है—तो उसका दोषी कौन? बरसात के दिनों में नालियों का घरों में घुस जाता है सड़के तालाब बन जाती हैं सरकारी अस्पतालों पीने का पानी नहीं गंदगी दुर्गंध इतनी की पूछो मत नकली दवाईयों और मिलावटी खाद्य पदार्थों से पूरा बाजार भरा हुआ है।
जनता जवाबदेह है, तो सरकार क्यों नहीं?

जब सरकार कर वसूलती है—इनकम टैक्स, रोड टैक्स, जीएसटी, नगर निगम शुल्क—तो उसके बदले नागरिक बुनियादी सुविधाओं की उम्मीद करता है। वह सड़क चाहता है, गड्ढा नहीं। वह स्ट्रीट लाइट चाहता है, अंधेरा नहीं। वह फुटपाथ चाहता है, अतिक्रमण नहीं। वह जीवन चाहता है, जुर्माना नहीं।
परंतु स्थिति यह है कि नागरिक तो चूक पर तुरंत दंडित होता है, लेकिन सरकार की चूक पर कोई सजा नहीं।
कोई नगर निगम अभियंता निलंबित नहीं होता,
कोई ट्रैफिक विभाग जवाब नहीं देता,
कोई स्थानीय नेता माफी नहीं मांगता।
“उत्तरदायित्व” केवल एकतरफा क्यों?
सवाल उठता है—क्या ये देश सिर्फ आम नागरिकों की जवाबदेही से चलेगा?
जब सड़क पर हादसा गड्ढे के कारण होता है,
तो क्या केवल ड्राइवर को जिम्मेदार ठहराना न्याय है?
जब सड़क पर स्ट्रीट लाइट नहीं है और दुर्घटना होती है,
तो क्या ट्रैफिक पुलिस की जिम्मेदारी नहीं बनती?
जब पूरे मोहल्ले में नालियां उफन रही हों,
तो क्या नगर निगम को भी चालान नहीं मिलना चाहिए?
लोकतंत्र का असंतुलित तराजू
लोकतंत्र में अगर नियम केवल एक पक्ष के लिए हों,
तो वह लोकतंत्र नहीं, शासन व्यवस्था की तानाशाही बन जाता है।
नागरिक को जागरूक करने से पहले
सरकार को जवाबदेह बनाना होगा।
नियम बनाने से पहले
सुविधाएं देना ज़रूरी है।
और जुर्माना वसूलने से पहले
सरकार को प्रशासनिक शर्म महसूस करनी होगी। ‘जिम्मेदार कौन?’
सरकारें बदलती हैं, बजट बदलते हैं, घोषणाएं होती हैं, योजनाएं बनती हैं, लेकिन हालात जस के तस रहते हैं।
कभी सड़कों पर गड्ढे, कभी सिग्नलों पर अंधकार, कभी अस्पतालों में लापरवाही, कभी विद्यालयों में अध्यापक नदारद।
हर गड़बड़ी के बावजूद सरकार खुद को पाक-साफ दिखाने की कोशिश करती है,
और जनता को हर बार जुर्माने के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
क्या यही लोकतंत्र है?
यदि जुर्माना केवल जनता के लिए है, तो व्यवस्था को भी आईना दिखाने का वक्त आ गया है।
क्योंकि सड़क पर गड्ढा सिर्फ झटका नहीं देता—वह सरकार की जवाबदेही का गड्ढा है।



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