

कोतमा (अनूपपुर)। वर्षों से स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे कोतमा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी को लेकर दायर जनहित याचिका पर उच्च न्यायालय जबलपुर ने ऐतिहासिक आदेश पारित किया है। पूर्व पार्षद देवशरण सिंह और समाजसेवी दीपक पटेल द्वारा नगर के अधिवक्ता राजेश शर्मा के माध्यम से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैथ और न्यायाधीश विवेक जैन की डबल बेंच ने आदेश में कहा कि कोतमा सीएचसी में स्वीकृत 15 डॉक्टरों में से 7 पद खाली हैं, जबकि सभी विशेषज्ञ पद रिक्त पड़े हैं।
अदालत ने प्रमुख सचिव स्वास्थ्य विभाग, मध्यप्रदेश शासन को निर्देशित किया कि एक सप्ताह के भीतर कम से कम एक विशेषज्ञ चिकित्सक, एक सर्जन और एक महिला स्त्री रोग विशेषज्ञ की नियुक्ति अनिवार्य रूप से की जाए। साथ ही, सभी रिक्त पदों को अधिमानतः चार सप्ताह के भीतर भरने का आदेश भी पारित किया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल डॉक्टरों की तैनाती से आदेश का पालन पूरा नहीं होगा, बल्कि विशेषज्ञों के उपयोग के लिए जरूरी उपकरणों की व्यवस्था भी अनिवार्य रूप से 15 दिनों के भीतर की जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि प्रमुख सचिव स्वास्थ्य विभाग की ओर से आदेश का पालन नहीं किया जाता है, तो याचिकाकर्ता आवेदन प्रस्तुत कर पुनः सुनवाई करवा सकते हैं, क्योंकि यह मामला आदिवासी बहुल सुदूर क्षेत्र के नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा है।
याचिका की पिछली सुनवाई में शासकीय अधिवक्ता द्वारा निर्देश प्राप्त करने के लिए समय मांगा गया था, जिसे न्यायालय ने 2 सप्ताह की मोहलत देते हुए स्वीकृत किया। इस बीच 27 जून 2025 को राज्य शासन ने आदेश के पालन की दिशा में कार्य करते हुए कोतमा सीएचसी में 2 विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति कर दी है, जिससे स्थानीय नागरिकों में राहत की उम्मीद जगी है।
हालांकि, अभी भी कई विशेषज्ञ पद खाली हैं। नागरिकों ने उम्मीद जताई कि अदालत के निर्देशानुसार अन्य रिक्त पद भी जल्द भरे जाएंगे। यह पहल कोतमा के नागरिकों, विशेषकर पूर्व पार्षद देवशरण सिंह, दीपक पटेल और अधिवक्ताओं राजेश शर्मा एवं अभिषेक पांडे की सक्रियता का परिणाम है, जिन्होंने क्षेत्र के लोगों को स्वास्थ्य सुविधा दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कानूनी रूप से महत्वपूर्ण बिंदु
उच्च न्यायालय ने आदेश में डॉक्टरों की नियुक्ति के साथ उपकरणों की व्यवस्था भी अनिवार्य की।
आदेश के उल्लंघन की स्थिति में याचिका पुनर्जीवित कर कार्रवाई का अधिकार याचिकाकर्ता को सुरक्षित रखा गया।
यह आदेश आदिवासी बहुल इलाके के नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।



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