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30 बार मरकर भी जिंदा रहा रमेश, 279 मौतों का राज और 11 करोड़ की लूट – मप्र का सबसे ‘ज़हरीला’ भ्रष्टाचार!

30 बार मरकर भी जिंदा रहा रमेश, 279 मौतों का राज और 11 करोड़ की लूट – मप्र का सबसे ‘ज़हरीला’ भ्रष्टाचार!


एक हास्यास्पद हकीकत, जहाँ कागजों पर सांपों ने सरकारी खजाने को डंसा और इंसानों ने इसे “आपदा” बता डकार लिया

भारत में भ्रष्टाचार की कहानियाँ अकसर अद्भुत होती हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में घटित ‘सांप घोटाला’ अपने आप में ऐसा प्रकरण बन गया है जिसे शायद भविष्य में “कागजी सांपों का क्रांति काल” कहा जाएगा। इस घोटाले में न तो सर्पविद्या की ज़रूरत पड़ी, न ही तांत्रिकों की—बस कुछ सरकारी बाबुओं, कुछ मुर्दों और बहुत सारी फर्जी कहानियों की कलम-कला ने मिलकर ऐसी स्क्रिप्ट लिखी कि मृत्यु भी शर्म से दोहराने लगी, “मुझे इतनी बार मत मारो!”


‘मरने की फुलटाइम नौकरी’ रमेश को 30 बार मरा बताया

मध्य प्रदेश की आपदा राहत योजना में स्पष्ट है—प्राकृतिक आपदा से मृत्यु पर 4 लाख रुपए की राहत। लेकिन सिवनी की केवलारी तहसील के अधिकारियों ने इस नियम को इतना लचीलापन दे दिया कि एक ही व्यक्ति को कागजों में 30 बार मरवाया गया। और हर बार मौत की वजह एक ही—सांप का काटना! इस महाकाव्यात्मक मृत्यु यात्रा में रमेश ने इतने अवतार लिए कि कल्कि अवतार भी खुद को रिज़र्व में रख लें।


‘जहरीली मुनाफाखोरी’ जब सांप सरकारी खजाने के एजेंट बन गए

यह घोटाला सुनने में जितना हास्यास्पद है, उतना ही खतरनाक है। 279 फर्जी मौतें, करीब 11 करोड़ रुपए का गबन और पूरे आपदा राहत तंत्र की बुनियाद को ही चबा गए ये कथित “सांप”। इस योजना को लागू करने में लगे अफसरों ने जिस रचनात्मकता से काम किया है, वो अगर साहित्य में लगाते तो शायद उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका होता।


‘नाम वही, कहानी नई’ रामकुमार की 19 मौतें और सरकारी संवेदना की विडंबना

रमेश के अलावा रामकुमार नामक व्यक्ति भी इसी “बार-बार मरो, पैसा पाओ योजना” का लाभार्थी बना। उसे भी 19 बार सर्पदंश का शिकार बताया गया, जिससे साफ है कि इस योजना में एक बार मरना घाटे का सौदा था। यहाँ ज्यादा लाभ उन्हीं को मिला जो बार-बार मरने की लगन दिखा सके।


तहसील का ‘थ्रिलर ड्रामा’ 45 दोषी, रिपोर्ट में अफसर भी, FIR में सिर्फ चपरासी!

फायनेंस विभाग की 7 सदस्यीय जांच रिपोर्ट ने 45 लोगों को दोषी ठहराया, जिनमें तत्कालीन SDM, तहसीलदार, प्रभारी तहसीलदार जैसे बड़े नाम शामिल हैं। लेकिन पुलिस की FIR में इन VIP मृत्युदाताओं का नाम नहीं है—गिरफ्तार हुए सिर्फ छोटे कर्मचारी, खासकर ‘बाबू’ सचिन दहायत, जो शायद इस कहानी के क्लाइमैक्स निर्देशक रहे। बाकी अफसरों के लिए शायद पुलिस ने नया वर्गीकरण किया हो: “प्राकृतिक आपदा नहीं, राजनीतिक आपदा के शिकार।”

जांच रिपोर्ट में भी हेराफेरी ‘डॉक्युमेंट्स देखे ही नहीं’—जांचकर्ता

ये तो उस रोमांचक फिल्म जैसा है जिसमें हीरो आँखों पर पट्टी बांधकर अपराध सुलझा ले। जांचकर्ता टीम ने खुद ही लिखा कि दस्तावेजों का मिलान नहीं किया गया, तो फिर यह रिपोर्ट नहीं, काव्यात्मक कल्पना हो गई। इससे निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं—या शायद ‘सवाल खड़ा करना’ भी अब कोई विभागीय आपदा हो।

राजनीति का विषदंश कांग्रेस ने साधा निशाना, कहा ‘यह सांपों का घोटाला है’

कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा, “मध्य प्रदेश में सांपों की गिनती तो मोहन यादव करवा रहे हैं, लेकिन सिवनी में सांपों की ‘कमाई’ देख कर नागराज भी जल गए होंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि एक व्यक्ति को 48 बार मरा बताकर पैसा निकाला गया है—“इतनी बार तो सावन में मेंढक भी नहीं उछलते।”

‘सांप-संस्कृति’ का दस्तावेजी प्रमाण मध्यप्रदेश में हुआ जो कहीं नहीं हुआ

पत्रकार मनीष तिवारी ने कहा कि ये मामला 2019 से 2022 के बीच का है—कमलनाथ और शिवराज दोनों सरकारों के समय चला। यह घोटाला बताता है कि मध्य प्रदेश में कुछ भी संभव है—यहाँ विकास भले धीमा हो, लेकिन भ्रष्टाचार और ‘कागजी मृत्यु’ के रिकॉर्ड हर साल टूटते हैं।
ये सिर्फ सांप नहीं, व्यवस्था के ‘सिस्टमेटिक विष’ हैं

सिवनी का यह घोटाला सिर्फ भ्रष्टाचार की कहानी नहीं, यह “सांपों के नाम पर किए गए सभ्य समाज के अपमान” की कहानी है। यह दर्शाता है कि जब संस्थाएं संवेदना को लूट की स्क्रिप्ट बना लें, तब मृत्यु भी मज़ाक बन जाती है।

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