शहडोल संभाग की अनदेखी पर सियासी गलियारों में सुगबुगाहट तेज

शहडोल। विंध्य विकास प्राधिकरण की नवीन नियुक्तियों के बाद रीवा, सतना और शहडोल संभाग में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। प्राधिकरण के अध्यक्ष पद पर पंचूलाल प्रजापति की नियुक्ति की गई है, जबकि उपाध्यक्ष के रूप में डॉ. अजय सिंह और संजय तीर्थनी को जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन नियुक्तियों के सार्वजनिक होने के बाद क्षेत्रीय संतुलन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विशेष रूप से शहडोल संभाग के तीनों जिलों उमरिया, अनूपपुर और शहडोल का नाम इस सूची से गायब होना चर्चा का मुख्य केंद्र बना हुआ है।

​क्षेत्रीय समीकरण और प्रतिनिधित्व का अभाव

शहडोल संभाग का इस महत्वपूर्ण प्राधिकरण से बाहर होना चौंकाने वाला माना जा रहा है, क्योंकि पूर्व के समय में इस क्षेत्र को उचित स्थान मिलता रहा है। हालिया चुनावी नतीजों की दृष्टि से देखें तो इस क्षेत्र ने सत्तारूढ़ दल को बड़ी मजबूती प्रदान की है। संभाग की 7 विधानसभा सीटों पर जीत और 1 लोकसभा सीट पर समर्थन मिलने के बाद भी प्राधिकरण में प्रतिनिधित्व न मिलना स्थानीय स्तर पर असंतोष का कारण बन सकता है। राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल चुनावी आंकड़ों से हटकर नेतृत्व के नए पैमानों के रूप में देख रहे हैं।

​प्राधिकरण की भूमिका और चयन के मानक

विंध्य विकास प्राधिकरण क्षेत्र के बुनियादी ढांचे, जल संसाधन, पर्यटन और रोजगार सृजन की योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए एक रणनीतिक मंच है। इसके पदों को केवल राजनीतिक पद न मानकर विकास की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है। चर्चा है कि शीर्ष नेतृत्व ने इस बार चयन के लिए केवल जीत को आधार नहीं बनाया है, बल्कि कार्यक्षमता और विकास को लेकर सक्रियता को प्राथमिकता दी है। शहडोल संभाग में चुनाव के बाद विकास कार्यों में अपेक्षित गति न आ पाना और राजनीतिक सक्रियता का सीमित रहना इस अनदेखी का एक बड़ा कारण माना जा रहा है।

​भविष्य की राजनीति और विकास के संकेत

संभाग की अनुपस्थिति को एक स्पष्ट संकेत के तौर पर लिया जा रहा है कि आने वाले समय में केवल चुनावी जीत नेतृत्व की गारंटी नहीं होगी। प्रभावी कार्यप्रणाली और ठोस योजनाओं पर काम करना नेताओं के लिए अनिवार्य होगा। वर्तमान में क्षेत्र के जनप्रतिनिधि इस विषय पर मौन साधे हुए हैं, लेकिन अंदरूनी तौर पर यह घटनाक्रम भविष्य की क्षेत्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए भरोसे के साथ-साथ कार्य की स्पष्टता भी एक अनिवार्य शर्त बनती जा रही है।

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