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“एक हादसा… कई ज़िंदगियों का अधूरा अंत”

“एक हादसा… कई ज़िंदगियों का अधूरा अंत”



कैलाश पाण्डेय
घटना घट चुकी है… धूल बैठ रही है… पर सवाल अब भी हवा में तैर रहे हैं…
लोग आते हैं… मलबा देखते हैं… दुख जताते हैं… और लौट जाते हैं…
लेकिन उस गड्ढे में अब भी सिर्फ मिट्टी नहीं… कई जिंदगियों की पारिवारिक जिम्मेदारियों की  चीख दबी है…
जहां कभी इमारत थी… अब मौत का गड्ढा है… और उसके चारों ओर खड़ी है बेबस भीड़…में  चौरंगी लाल कहता है गरीब मजदूरों के जीवन का सफर अधूरा रह गया और जीवन पूरा खत्म हो गया
कक्का चौपाल में कहते हैं “हादसे अचानक नहीं होते… बनाए जाते हैं…”
घसीटा पूछता है “कक्का… अब सब दोषियों को पकड़ेंगे न?”
चौरंगी लाल हंसता है “अब शुरू होगा बचाने का खेल…”
कागज बनेंगे… बयान बदलेंगे… और जिम्मेदारी इधर-उधर घूमेगी…
नगर पालिका कोतमा और श्रम विभाग सवालों में है…
क्या मजदूरों की सुरक्षा देखने वाला कोई था भी…?
उधर कोतमा में गांधी जी की प्रतिमा के सामने मृतकों को श्रद्धांजलि दी गई…
कांग्रेस जिला अध्यक्ष गुड्डू चौहान दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं…
भीड़ में आक्रोश है… पर जवाब अब भी गायब हैं…
कक्का कहते हैं “जांच अगर सच्ची हो… तो सच छुप नहीं सकता…”
“पर अगर नीयत ही कमजोर हो… तो हर फाइल अधूरी रह जाती है…”
घसीटा की आवाज कांपती है“तो क्या ये भी बस कागजों में खत्म हो जाएगा?”
कक्का गहरी सांस लेते हैं “ये कोतमा है ”
“या तो ये हादसा सबक बनेगा… या सिर्फ एक खबर बनकर रह जाएगा…”
मलबे के पास खड़ी भीड़ अब जवाब चाहती है…
और चौपाल आखिरी सवाल छोड़ जाती है—“क्या इस बार सच बचेगा… या फिर से दब जाएगा…?”

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