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“परमाणु क्रांति: 3000+ वर्षों की ऊर्जा सुरक्षा की ओर भारत की छलांग, दुनिया का दूसरा देश बना”

“परमाणु क्रांति: 3000+ वर्षों की ऊर्जा सुरक्षा की ओर भारत की छलांग, दुनिया का दूसरा देश बना”

🇮🇳 भारत की परमाणु क्रांति कलपक्कम PFBR की ऐतिहासिक सफलता और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की नई सुबह
कलपक्कम (तमिलनाडु) | 7 अप्रैल, 2026
भारत ने विज्ञान, तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए दुनिया को अपनी क्षमता का परिचय दे दिया है। तमिलनाडु के कलपक्कम परमाणु परिसर में स्थापित 500 मेगावाट क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने सफलतापूर्वक ‘क्रिटिकैलिटी’ हासिल कर ली है। यह उपलब्धि केवल एक तकनीकी सफलता नहीं, बल्कि भारत के 2047 तक ऊर्जा आत्मनिर्भर बनने के संकल्प की दिशा में निर्णायक कदम है।
परमाणु विज्ञान की भाषा में ‘क्रिटिकैलिटी’ उस अवस्था को कहा जाता है, जब रिएक्टर के भीतर परमाणु विखंडन (फिशन) की प्रक्रिया नियंत्रित और सतत रूप से स्वयं चलने लगती है। इसका अर्थ यह है कि अब यह रिएक्टर बाहरी सहायता के बिना निरंतर ऊर्जा उत्पन्न करने की स्थिति में आ गया है। किसी भी परमाणु संयंत्र के संचालन में यह सबसे कठिन और महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।
कलपक्कम का यह PFBR रिएक्टर अपनी विशेष तकनीक के कारण वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। इसे ‘ब्रीडर रिएक्टर’ कहा जाता है, क्योंकि यह पारंपरिक रिएक्टरों के विपरीत केवल ईंधन का उपयोग ही नहीं करता, बल्कि उससे अधिक नया ईंधन भी तैयार करता है। जहां सामान्य रिएक्टर यूरेनियम को जलाकर समाप्त कर देते हैं, वहीं PFBR में प्रयुक्त प्लूटोनियम-यूरेनियम मिश्रित ऑक्साइड (MOX) ईंधन ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ नए प्लूटोनियम ईंधन का निर्माण भी करता है। यह “वेस्ट टू वेल्थ” की अवधारणा का सशक्त उदाहरण है, जिसमें परमाणु कचरे को भी उपयोगी ऊर्जा में बदला जा सकता है।
इस उपलब्धि के साथ भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है, जिनके पास व्यावसायिक स्तर का फास्ट ब्रीडर रिएक्टर मौजूद है। अभी तक यह तकनीक मुख्य रूप से रूस के पास ही सक्रिय रूप में थी। ऐसे में भारत का इस क्षेत्र में प्रवेश न केवल तकनीकी श्रेष्ठता को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में उसकी सशक्त उपस्थिति को भी स्थापित करता है।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना का निर्माण भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) द्वारा किया गया है। सबसे गर्व की बात यह है कि यह परियोजना पूरी तरह स्वदेशी तकनीक और संसाधनों पर आधारित है। इसमें देश की 200 से अधिक कंपनियों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (MSMEs) ने योगदान दिया है। यह ‘मेक इन इंडिया’ पहल की अब तक की सबसे बड़ी और सफल मिसाल के रूप में उभरी है।
तकनीकी दृष्टि से यह रिएक्टर अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है। यह सोडियम कूल्ड फास्ट ब्रीडर रिएक्टर है, जिसमें पानी के स्थान पर तरल सोडियम का उपयोग शीतलक के रूप में किया जाता है। सोडियम की विशेषता यह है कि वह उच्च तापमान को तेजी से अवशोषित करता है और कम दबाव पर कार्य करता है, जिससे रिएक्टर की कार्यक्षमता और सुरक्षा दोनों बढ़ जाती हैं। इसकी कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 500 मेगावाट है, जबकि थर्मल क्षमता 1253 मेगावाट है। इसे लगभग 40 वर्षों तक निरंतर संचालन के लिए डिजाइन किया गया है।
इस रिएक्टर की कार्यप्रणाली भी अत्यंत उन्नत है। इसके केंद्र (कोर) में प्लूटोनियम ईंधन जलकर ऊर्जा उत्पन्न करता है, जबकि इसके चारों ओर स्थित ‘ब्लैंकेट’ क्षेत्र में यूरेनियम-238 की परत होती है। जब कोर से निकलने वाले न्यूट्रॉन इस परत से टकराते हैं, तो वे इसे प्लूटोनियम-239 में परिवर्तित कर देते हैं, जो एक नया ईंधन है। इस प्रकार यह रिएक्टर जितना ईंधन उपयोग करता है, उससे अधिक उत्पन्न भी करता है।
सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी PFBR को अत्यंत उच्च मानकों के साथ तैयार किया गया है। इसमें ‘पैसिव सेफ्टी’ तकनीक का उपयोग किया गया है, जिसके अंतर्गत किसी भी आपात स्थिति में रिएक्टर स्वतः सुरक्षित रूप से बंद हो जाता है। इसके अलावा, दोहरी सुरक्षा दीवार (डबल कंटेनमेंट) प्रणाली सुनिश्चित करती है कि किसी भी स्थिति में रेडियोधर्मी तत्व बाहर न निकल सकें। सोडियम और पानी की संभावित प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने के लिए विशेष नाइट्रोजन कवर और उन्नत हीट एक्सचेंजर प्रणाली भी स्थापित की गई है। इसे भूकंप और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है।
भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में यह उपलब्धि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह देश के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण को मजबूती प्रदान करती है। पहले चरण में भारी जल रिएक्टरों के माध्यम से प्लूटोनियम का उत्पादन किया जाता है, दूसरे चरण में इसी प्लूटोनियम का उपयोग PFBR जैसे रिएक्टरों में किया जाता है, जबकि तीसरे चरण में थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।
भारत के पास यूरेनियम के सीमित भंडार हैं, लेकिन थोरियम के मामले में वह दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। कलपक्कम का PFBR इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कड़ी है, क्योंकि यह भविष्य में थोरियम आधारित रिएक्टरों के लिए आवश्यक ईंधन तैयार करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक पूर्ण रूप से सफल हो जाती है, तो भारत आने वाले 3000 से 4000 वर्षों तक अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करने में सक्षम हो सकता है।
क्रिटिकैलिटी हासिल करने के बाद अब वैज्ञानिक इस रिएक्टर पर कम शक्ति स्तर के परीक्षण करेंगे, जिन्हें ‘फिजिक्स एक्सपेरिमेंट’ कहा जाता है। इन परीक्षणों के सफल होने के पश्चात इसे राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड से जोड़ा जाएगा, जिससे यह आम उपभोक्ताओं तक बिजली पहुंचाने लगेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उपलब्धि पर देश के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई देते हुए इसे “विकसित भारत की ऊर्जा यात्रा में मील का पत्थर” बताया है।
स्पष्ट है कि कलपक्कम PFBR केवल एक वैज्ञानिक परियोजना नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की ऊर्जा स्वतंत्रता, पर्यावरणीय संतुलन और तकनीकी आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव है। यह उपलब्धि आने वाले समय में न केवल देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगी, बल्कि भारत को वैश्विक परमाणु ऊर्जा मानचित्र पर अग्रणी स्थान भी दिलाएगी।

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