
“1990 में कश्मीरी पंडितों का पलायन आतंकवाद, धमकियाँ और धार्मिक नारेबाज़ी के बीच सामूहिक विस्थापन”
1990 का कश्मीर पृष्ठभूमि और घटनाक्रम
जनवरी 1990 में, कश्मीर घाटी में उग्रवाद और अलगाववादी आंदोलनों के चलते लगभग 90,000 से 100,000 कश्मीरी पंडितों ने घाटी छोड़ दी थी। कुछ अनुमानों के अनुसार यह संख्या 150,000 तक हो सकती है।
14 सितंबर 1989 को, भाजपा नेता टीका लाल टपलू की हत्या के बाद, पंडित समुदाय में भय व्याप्त हो गया था। इसके बाद, कई अन्य पंडितों की लक्षित हत्याएं हुईं।
4 जनवरी 1990 को, श्रीनगर के उर्दू अख़बार ‘अफ़ताब’ में हिज़बुल मुजाहिदीन की ओर से एक धमकी भरा संदेश प्रकाशित हुआ, जिसमें सभी हिंदुओं को कश्मीर छोड़ने की चेतावनी दी गई थी।
मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर कुछ कट्टरपंथी नारों के माध्यम से पंडितों को धमकाया गया, जैसे
“ज़ालिमों, ओ काफ़िरों, कश्मीर हमारा छोड़ दो”
“कश्मीर में अगर रहना है, अल्लाह-ओ-अकबर कहना होगा”
“मुसलमानों जागो, काफ़िरों भागो”
“कश्मीर बनेगा पाकिस्तान”
“यहाँ क्या चलेगा? निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा”
“कश्मीर बनाओ पाकिस्तान, बटवारा नहीं बटने वाला”
“दिल में रखो अल्लाह का ख़ौफ़; हाथ में रखो कलाश्निकोव”
“रालिव, चलिव या गलिव” (धर्मांतरण करो, भागो या मरो)
इन घटनाओं के परिणामस्वरूप, पंडित समुदाय ने बड़े पैमाने पर पलायन किया और जम्मू, दिल्ली व अन्य क्षेत्रों में शरण ली।
“2025 में पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से ‘हिंदुओं को निकालने’ की आवाज़ें तथ्य और सत्यापन”
वर्तमान स्थिति अफवाह या सच्चाई?
अब तक, किसी भी प्रमुख राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ने पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से “हिंदुओं को निकालने” की आवाज़ों की पुष्टि नहीं की है।
सोशल मीडिया पर इस प्रकार के दावे प्रसारित हो रहे हैं, लेकिन उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है।
पश्चिम बंगाल सरकार या केंद्र सरकार की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
कृपया ध्यान दें इस प्रकार के संवेदनशील मामलों में अफवाहों से सावधान रहें।
1990 में कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के साथ हुई घटनाएं ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित हैं, जिनमें उग्रवाद, धमकियाँ और धार्मिक नारेबाज़ी शामिल थीं।
बंगाल फाइल्स और कश्मीर फाइल्स एक तुलनात्मक समीक्षा
कश्मीर फाइल्स – एक ऐतिहासिक दस्तावेज़
1989-1990 का कालखंड भारत के इतिहास में एक काला अध्याय बन गया जब कश्मीर घाटी में हजारों कश्मीरी हिंदू (पंडित) अपने ही देश में शरणार्थी बन गए। कट्टरपंथी संगठनों द्वारा मस्जिदों से ‘काफिर भागो’, ‘इस्लाम आएगा’ जैसे नारे लगाकर पूरे हिंदू समुदाय को डराया गया और सामूहिक पलायन को मजबूर किया गया।
प्रमुख घटनाएं
1989 में शुरू हुआ मुस्लिम चरमपंथ और उग्रवाद।
1990 में ‘राल्फ शाहीन’ जैसे रेडियो उद्घोषकों द्वारा खुलेआम धमकियां।
मस्जिदों से ‘कश्मीर छोड़ दो’ की घोषणा।
3.5 लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों का घाटी से पलायन।
महिलाओं के साथ दुष्कर्म और घरों को जला दिया गया।
पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का प्रोत्साहन मिला।
राजनीतिक निष्क्रियता और वोट बैंक की राजनीति।
मीडिया और न्याय प्रणाली की चुप्पी।
बंगाल फाइल्स – आधुनिक युग का नया संकट
2023-2025 के बीच पश्चिम बंगाल के कुछ जिलों से आ रही घटनाओं ने फिर वही डरावनी स्थिति दोहराई जो 1990 के कश्मीर में देखी गई थी। मस्जिदों से उकसाने वाले भाषण, ‘बंगाल खाली करो’ जैसे नारे, हिंदू परिवारों का पलायन – यह सब अब केवल घटनाएं नहीं, एक सुनियोजित संरचना के संकेत हैं।
प्रमुख घटनाएं
“बंगाल फाइल्स जब इतिहास दोहराया जा रहा– भय, पलायन और चुप्पी”मस्जिदों से भड़काऊ भाषण – ‘दारुल इस्लाम बनाएंगे’, ‘हिंदू बंगाल छोड़ो’।
मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर में हिंदुओं का सामूहिक पलायन।
पंचायत स्तर पर धमकी और दबाव।
मंदिरों पर हमले, धर्मांतरण के प्रयास।
सीमा पार से घुसपैठ (बांग्लादेश, रोहिंग्या)।
स्थानीय प्रशासन की तुष्टिकरण नीति।
राजनीतिक संरक्षण और मीडिया की चुप्पी। तुलनात्मक समीक्षा – कश्मीर बनाम बंगाल
बंगाल और कश्मीर – दो राज्य, दो कालखंड, परंतु समान पीड़ा। कश्मीर फाइल्स से हमने सीखा नहीं, और अब बंगाल फाइल्स फिर वही इतिहास दोहराने का संकेत दे रही है। यह समय है जागने का, पहचानने का कि तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के चलते कैसे एक पूरा समुदाय असुरक्षित हो जाता है। चाहे वह किसी वर्ग का हो।
यदि अब भी भारत की जनता, मीडिया, और न्यायिक संस्थाएं आंखें बंद रखेंगी – तो 2030 तक भारत के कई हिस्सों में ‘फाइल्स’ ही फाइल्स बचेंगी –कश्मीर फाइल्स”के बाद बंगाल फाइल्स, केरल फाइल्स, यूपी फाइल्स, और शायद अंतिम फाइल
“बंगाल फाइल्स” बनाम “कश्मीर फाइल्स” – तुलनात्मक समीक्षा है। इसमें दोनों घटनाओं के ऐतिहासिक और सामाजिक पक्षों की तुलना की गई है नारों से लेकर प्रशासन की भूमिका तक।



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