
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने सत्ता में आते ही अपनी पांच बड़ी गारंटियों पर काम शुरू कर दिया है। चुनावों के दौरान यह वादे इतने लुभावने थे कि जनता ने बिना सोचे-समझे इन्हें “जनता की जीत” मान लिया। अब जब वादे पूरे करने की बारी आई, तो सरकार ने जनता को ही कुर्बानी का बकरा बना दिया। “गारंटी पूरी करेंगे, लेकिन खर्चा आपका होगा” का संदेश देते हुए कांग्रेस ने अपने “मास्टर प्लान” में पेट्रोल-डीजल पर टैक्स बढ़ाने का आइडिया पेश किया है।
कांग्रेस का गारंटी दर्शन
कांग्रेस की पांच गारंटी योजनाएं सुनने में तो “गरीबों का मसीहा” जैसी लगती हैं
गृह लक्ष्मी योजना महिलाओं को ₹2,000 मासिक।
गृह ज्योति योजना 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली।
शक्ति योजना महिलाओं के लिए बसों में मुफ्त यात्रा।
अन्न भाग्य योजनाbहर परिवार को 10 किलो मुफ्त चावल।
युवा निधि योजनाbबेरोजगारों को भत्ता।
लेकिन असली सवाल यह है कि ये “मुफ्त का माल” बांटने के लिए सरकार के खजाने में पैसा आएगा कहां से?
पेट्रोल-डीजल पर जनता का तेल निकालेगी सरकार
कांग्रेस सरकार ने घोषणा की है कि इन योजनाओं को लागू करने के लिए सालाना ₹50,000 करोड़ की जरूरत होगी। इस रकम का बड़ा हिस्सा पेट्रोल और डीजल पर टैक्स बढ़ाकर जुटाने की योजना है।
अब तक तो जनता सोच रही थी कि ये योजनाएं सरकार के खजाने से आएंगी, लेकिन हकीकत में यह पैसा सीधे उनकी जेबों से निकलेगा। कांग्रेस का नया नारा बन गया है:
“आपकी जेब से पैसा निकलेगा, गरीबों को गारंटी मिलेगी।”
कांग्रेस के वित्तीय जादूगरों का खेल
कांग्रेस की आर्थिक टीम ने ऐसा गणित तैयार किया है, जो सिर्फ सरकार को ही समझ आता है।
पेट्रोल की कीमत में ₹2 से ₹5 प्रति लीटर की वृद्धि की संभावना है।
डीजल पर भी ₹3 तक का अतिरिक्त कर लगाया जा सकता है।
मुफ्त की शराब और महंगा पेट्रोल
विपक्ष के तीर और जनता का दर्द
भाजपा ने कांग्रेस सरकार पर हमला बोलते हुए इसे “जनता का शोषण” करार दिया है।
भाजपा नेता ने कहा, “कांग्रेस ने वादे तो कर दिए, लेकिन अब जनता पर टैक्स का बोझ डालकर उसे पूरा कर रही है। गरीबों को ₹2,000 देने के नाम पर पूरी अर्थव्यवस्था को गर्त में धकेला जा रहा है।”
लेकिन जनता का दर्द इससे कहीं गहरा है।
मध्यम वर्ग का गुस्सा “हम न तो गारंटी के लाभार्थी हैं और न ही बड़े अमीर। लेकिन हर बार टैक्स का बोझ हमें ही उठाना पड़ता है।”
गरीब वर्ग की उलझन “हमें ₹2,000 मिले, लेकिन अगर डीजल महंगा होगा, तो खाने-पीने की चीजें भी महंगी होंगी। यह फायदा है या नुकसान?”
चुनावी वादे और वास्तविकता का अंतर
कांग्रेस के “मुफ्त की योजनाओं” के वादे और उनके क्रियान्वयन में बड़ा अंतर है।
चुनाव प्रचार में यह कहा गया कि गारंटी पूरी तरह से सरकारी खजाने से पूरी की जाएगी।
लेकिन अब सरकारी खजाना खाली है, और भरने के लिए जनता की जेब को ही निशाना बनाया जा रहा है।
पेट्रोल-डीजल पर टैक्स बढ़ने से महंगाई की लहर शुरू हो सकती है।
परिवहन लागत बढ़ेगी, जिससे खाने-पीने की चीजों से लेकर निर्माण सामग्री तक महंगी हो जाएगी।
किसान भी प्रभावित होंगे, क्योंकि ट्रैक्टर और अन्य कृषि उपकरण डीजल पर चलते हैं।
“विकास” पर ब्रेक या गारंटी पर जोर?
सरकार ने अपने बजट में अन्य विकास योजनाओं में कटौती की है ताकि गारंटी योजनाओं के लिए धन जुटाया जा सके।
सड़क निर्माण और बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं धीमी हो रही हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी खर्च सीमित किया जा रहा है।
जनता की उम्मीदें और कांग्रेस का तर्क
सरकार ने अपने कदम का बचाव करते हुए कहा है कि
गरीबों को सशक्त बनाने के लिए यह योजनाएं आवश्यक हैं।
कर वृद्धि का बोझ न्यूनतम रखा जाएगा और इसका असर केवल उच्च और मध्यम वर्ग पर पड़ेगा।
कांग्रेस का यह कदम “रॉबिनहुड” बनने का प्रयास लगता है, जहां अमीरों से लेकर मध्यम वर्ग तक सभी को थोड़ा-थोड़ा लूटकर गरीबों को लाभ दिया जाए फ्री की गारंटी योजनाएं वह मिठाई हैं, जो दिखने में स्वादिष्ट हैं लेकिन खाने के बाद मधुमेह का खतरा बढ़ा देती हैं।
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने अपनी गारंटी योजनाओं के जरिए जनता को राहत देने की कोशिश की है, लेकिन इसे लागू करने के तरीके ने जनता की उम्मीदों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पेट्रोल-डीजल पर कर बढ़ाकर धन जुटाने की योजना तात्कालिक समाधान हो सकती है, लेकिन इसका दीर्घकालिक प्रभाव नकारात्मक हो सकता है।
भले ही गरीब वर्ग को इन योजनाओं से लाभ हो रहा हो, लेकिन मध्यम वर्ग और व्यापारी वर्ग इससे खासे नाराज हैं। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपने चुनावी वादों को पूरा करने में जनता की जेबों को और खाली करेगी, या कोई वैकल्पिक रास्ता खोजेगी अगली बार चुनावी रैलियों में जनता शायद पूछे, ‘मुफ्त की गारंटी के नाम पर हमारा और कितनी बार तेल निकालेगा?




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