
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026
प्रस्तुत लेख रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) द्वारा 30 अप्रैल 2026 को जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक का विश्लेषण करता है। यह सूचकांक बताता है कि पिछले पच्चीस वर्षों में प्रेस स्वतंत्रता की वैश्विक स्थिति अपने सबसे निम्नतम स्तर पर पहुँच गई है — 180 में से 94 से अधिक देश अब ‘कठिन’ या ‘अत्यंत गंभीर’ श्रेणी में हैं। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की 157वीं रैंकिंग इस संकट की गंभीरता को और रेखांकित करती है, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा युद्धग्रस्त फ़िलिस्तीन से भी नीचे है।
प्रत्येक वर्ष 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) अपना वार्षिक विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक जारी करता है। इस वर्ष 30 अप्रैल 2026 को प्रकाशित यह रिपोर्ट न केवल वैश्विक प्रेस की दशा का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है, बल्कि यह भी बताती है कि लोकतंत्र और सत्य की रक्षा के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता कितनी अनिवार्य है।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक : परिचय
फ्रांस की राजधानी पेरिस में स्थित एक अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) है। इसकी स्थापना वर्ष 1985 में फ्रांसीसी पत्रकार रोबर्ट मेनार द्वारा इस उद्देश्य से की गई थी कि विश्व भर में पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके तथा प्रेस की स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया जा सके। यह एक स्वतंत्र संगठन है, जो सरकारों से अलग रहकर कार्य करता है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र तथा संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के साथ सहयोग करता है। संस्था की स्थापना के लगभग सत्रह वर्ष बाद, 2002 में, इसने पहली बार विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक जारी किया। प्रारंभिक रिपोर्ट में 139 देशों को शामिल किया गया था, जबकि 2026 तक यह संख्या बढ़कर 180 देशों तक पहुँच गई है।
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) किसी देश में प्रेस की स्वतंत्रता का आकलन करने के लिए पाँच प्रमुख कसौटियों — राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक-सांस्कृतिक, सुरक्षा और विधायी — का उपयोग करता है। इन सभी मानकों के आधार पर देशों को शून्य से सौ के बीच एक समग्र स्कोर प्रदान किया जाता है, जहाँ अधिक स्कोर बेहतर प्रेस स्वतंत्रता को दर्शाता है। देशों को उनके समग्र स्कोर के आधार पर पाँच श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है — 85 से 100 अंक पर ‘उत्तम’, 70 से 85 पर ‘संतोषजनक’, 55 से 70 पर ‘समस्याग्रस्त’, 40 से 55 पर ‘कठिन’ और 0 से 40 अंक पर ‘अत्यंत गंभीर’।
सूचकांक में देशों की स्थिति की यह तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है जब हम श्रेणीवार वर्गीकरण पर दृष्टि डालते हैं। 180 देशों में से केवल 7 देश ‘उत्तम’ श्रेणी में स्थान पा सके हैं, जिनमें नॉर्वे, नीदरलैंड, एस्टोनिया, डेनमार्क तथा स्वीडन अग्रणी हैं — और यह कोई संयोग नहीं कि ये सभी देश उत्तरी यूरोप के सुदृढ़ लोकतांत्रिक परंपराओं वाले राष्ट्र हैं। इसके विपरीत, सूचकांक के अंतिम पाँच स्थानों पर सऊदी अरब (176वाँ), ईरान (177वाँ), चीन (178वाँ), उत्तर कोरिया (179वाँ) तथा इरिट्रिया (180वाँ) हैं, जहाँ स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग पूर्णतः अनुपस्थित है। शीर्ष और तल के बीच की यह गहरी खाई यह बताती है कि प्रेस की स्वतंत्रता आज केवल मुट्ठी भर देशों का विशेषाधिकार बनकर रह गई है।
वैश्विक परिदृश्य : पच्चीस वर्षों का सबसे गहरा संकट
इस वर्ष के सूचकांक में शीर्ष पाँच स्थानों पर क्रमशः नॉर्वे (92.72), नीदरलैंड (88.92), एस्टोनिया (88.54), डेनमार्क (88.47) और स्वीडन (87.61) हैं। यह कोई संयोग नहीं कि ये पाँचों देश उत्तरी यूरोप के हैं — जहाँ प्रेस की स्वतंत्रता केवल कानून में नहीं, संस्कृति में भी रची-बसी है। इन देशों में पत्रकार न तो सरकारी विज्ञापन पर निर्भर हैं, न राजनीतिक दबाव में काम करते हैं — यही उनकी प्रेस स्वतंत्रता की असली ताकत है। उल्लेखनीय है कि नॉर्वे लगातार दसवीं बार इस सूचकांक में प्रथम स्थान पर है।
इस वर्ष जारी सूचकांक का शीर्षक “पच्चीस वर्षों में प्रेस स्वतंत्रता का निम्नतम स्तर” है, जो यह दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर प्रेस की स्थिति अब अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है। आँकड़ों के अनुसार, जहाँ 2002 में केवल 13.7 प्रतिशत देश “कठिन” अथवा “अत्यंत गंभीर” श्रेणी में थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 52.2 प्रतिशत हो गई है। इसी प्रकार “अच्छी” श्रेणी में रहने वाली वैश्विक जनसंख्या 20 प्रतिशत से घटकर 1 प्रतिशत से भी कम रह गई है। यह स्पष्ट करता है कि प्रेस की स्वतंत्रता में गिरावट अब अपवाद नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक वैश्विक प्रवृत्ति बन चुकी है।
सूचकांक के पाँच संकेतकों में से विधायी संकेतक में इस वर्ष सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2025 से 2026 के बीच 180 में से 110 देशों में इसका स्कोर घटा है, जो यह दर्शाता है कि पत्रकारिता का अपराधीकरण तेजी से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा तथा आपातकालीन कानूनों का दुरुपयोग सार्वजनिक हित से जुड़ी रिपोर्टिंग को सीमित कर रहा है। इसके साथ ही, कई देशों में पत्रकारों के प्रति बढ़ता हुआ आक्रामक और शत्रुतापूर्ण राजनीतिक वातावरण — जिसमें सार्वजनिक रूप से पत्रकारों को बदनाम करना, उन्हें निशाना बनाना तथा उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाना शामिल है — मीडिया की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से कमजोर कर रहा है।
यह प्रवृत्ति विभिन्न देशों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जैसे भारत (157वाँ स्थान), मिस्र (169वाँ), इज़राइल (116वाँ) तथा जॉर्जिया (135वाँ)। सत्तावादी व्यवस्थाओं में यह स्थिति अधिक कठोर रूप ले लेती है, जहाँ रूस (172वाँ), चीन (178वाँ), उत्तर कोरिया (179वाँ) और इरिट्रिया (180वाँ) जैसे देशों में प्रेस पर प्रत्यक्ष नियंत्रण बना हुआ है। हालाँकि यह संकट केवल सत्तावादी देशों तक सीमित नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में भी मीडिया की आर्थिक स्थिति के कमजोर होने, विज्ञापन-निर्भरता तथा संस्थागत दबावों के कारण उसकी स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। उदाहरणस्वरूप, जापान (62वाँ स्थान) तथा हांगकांग (140वाँ) में विधायी प्रावधानों के माध्यम से पत्रकारिता पर दबाव देखा जा सकता है।
इसके अतिरिक्त, सशस्त्र संघर्ष भी प्रेस स्वतंत्रता के ह्रास का एक प्रमुख कारण है। इराक (162वाँ), सूडान (161वाँ) और यमन (164वाँ) जैसे देशों में पत्रकारों की सुरक्षा गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। विशेष रूप से गाज़ा पट्टी में अक्टूबर 2023 के बाद 220 से अधिक पत्रकारों की मृत्यु इस संकट की गंभीरता को दर्शाती है। क्षेत्रीय स्तर पर संयुक्त राज्य अमेरिका (64वाँ स्थान, 7 स्थान की गिरावट) सहित अमेरिका महाद्वीप में भी स्थिति बिगड़ी है, जबकि इक्वाडोर और पेरू जैसे देशों में पत्रकारों के विरुद्ध हिंसा ने प्रेस की स्थिति को और कमजोर किया है। इसके विपरीत, सीरिया ने 2026 में 36 पायदान की उल्लेखनीय छलाँग लगाई है।
भारत की स्थिति : लोकतंत्र में प्रेस का संकट
इस व्यापक वैश्विक परिदृश्य के भीतर भारत की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। 2025 में 151वें स्थान पर रहा भारत 2026 में छह पायदान और गिरकर 157वें स्थान पर पहुँच गया है। यह गिरावट इसलिए और अधिक पीड़ादायक है क्योंकि भारत अब पाकिस्तान (153वाँ), बांग्लादेश (152वाँ) और भूटान (150वाँ) जैसे देशों से भी नीचे है — और यहाँ तक कि फ़िलिस्तीन (156वाँ), जो इस समय सक्रिय युद्ध की विभीषिका झेल रहा है, भारत से एक पायदान ऊपर है। दक्षिण एशिया में केवल नेपाल (87वाँ) ‘समस्याग्रस्त’ श्रेणी में है, जबकि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और भूटान सभी ‘अत्यंत गंभीर’ श्रेणी में हैं।
नॉर्वे और भारत की तुलना जब पाँचों संकेतकों पर की जाती है तो यह खाई और भी स्पष्ट हो जाती है। नॉर्वे का कुल स्कोर 92.72 है जबकि भारत का मात्र 31.96 — अंतर 60.76 अंकों का। राजनीतिक संकेतक में यह खाई सबसे गहरी है — नॉर्वे 95.98 अंक के साथ विश्व में प्रथम है, जबकि भारत मात्र 21.16 अंक के साथ 160वें स्थान पर है — अंतर 74.82 अंकों का। आर्थिक संकेतक में नॉर्वे 87.22 और भारत 32.63 — अंतर 54.59 का। सामाजिक संकेतक में नॉर्वे 92.19 और भारत 33.65 — अंतर 58.54 का। सुरक्षा संकेतक में नॉर्वे 96.46 और भारत 32.77 — अंतर 63.69 का। सबसे कम अंतर विधायी संकेतक में है — नॉर्वे 91.76 और भारत 39.59 — फिर भी 52.17 अंकों का। यह तुलना केवल संख्याओं की नहीं — दो लोकतंत्रों की गुणवत्ता की भी तुलना है। हर एक संकेतक में भारत का स्कोर नॉर्वे के एक तिहाई से भी कम है।
भारत का यह संकट केवल आँकड़ों में नहीं, धरातल पर भी दिखता है। 1.4 अरब की आबादी वाले इस देश में लगभग 900 निजी टेलीविजन चैनल हैं, जिनमें आधे समाचार को समर्पित हैं। बीस से अधिक भाषाओं में लगभग 1,40,000 प्रकाशन हैं और 20,000 से अधिक दैनिक समाचार पत्रों की संयुक्त प्रसार संख्या 39 करोड़ से भी अधिक है — यानी मीडिया का विस्तार विशाल है, पर स्वतंत्रता सिकुड़ती जा रही है। रेडियो समाचार प्रसारण अभी भी राज्य का एकाधिकार है — ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन मिलकर प्रसार भारती के अंतर्गत काम करते हैं। इस विशाल मीडिया परिदृश्य में विविधता भी चिंताजनक रूप से अनुपस्थित है — प्रमुख समाचार चैनलों के शाम के परिचर्चा कार्यक्रमों में महिला अतिथियों की संख्या 15 प्रतिशत से भी कम है। सबसे गंभीर है सुरक्षा का प्रश्न — प्रतिवर्ष औसतन 2 से 3 पत्रकार अपने काम के कारण मारे जाते हैं, जो भारत को मीडिया पेशेवरों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक बनाता है।
आरएसएफ के अनुसार भारत में पत्रकारों के विरुद्ध हिंसा में वृद्धि, मीडिया स्वामित्व का अत्यधिक केंद्रीकरण और मीडिया संस्थानों का बढ़ता राजनीतिक झुकाव — ये तीनों मिलकर ‘विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र’ में प्रेस स्वतंत्रता को संकट में डाल रहे हैं।
भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का 157वें स्थान पर होना इस संकट की गंभीरता को और रेखांकित करता है। अंततः, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) की 2026 रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि प्रेस की स्वतंत्रता में गिरावट अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक गहराता हुआ वैश्विक संकट बन चुकी है, जिसके लिए सत्तावादी शासन, पक्षपाती राजनीतिक शक्तियाँ, आर्थिक हितों से प्रेरित कॉर्पोरेट संरचनाएँ तथा अनियंत्रित डिजिटल प्लेटफॉर्म सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस स्थिति के प्रति निष्क्रियता भी इसे मौन स्वीकृति देने के समान है। अतः यह समय केवल चिंता व्यक्त करने का नहीं, बल्कि निर्णायक हस्तक्षेप का है — जहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को पत्रकारों की सुरक्षा, विधायी दुरुपयोग की रोकथाम और संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा, प्रेस की स्वतंत्रता का यह क्षरण अंततः सत्य, पारदर्शिता और लोकतंत्र — तीनों के लिए एक गहरा संकट सिद्ध होगा। स्वतंत्र पत्रकारिता किसी दल या सरकार की शत्रु नहीं — वह लोकतंत्र की सबसे विश्वसनीय मित्र है।



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