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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में पिछड़ा वर्ग आरक्षण विवाद पर अंतिम बहस का आगाज कल से

जबलपुर। मध्य प्रदेश में लंबे समय से लंबित अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण से जुड़े विवाद में अब निर्णायक मोड़ आ गया है। प्रदेश के लाखों युवाओं और अभ्यर्थियों के भविष्य को प्रभावित करने वाले इस संवेदनशील मामले की अंतिम सुनवाई उच्च न्यायालय में शुरू हो रही है। यह सुनवाई 27 अप्रैल से 29 अप्रैल तक लगातार तीन दिनों तक चलने वाली है। अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए दोपहर 12:30 बजे से विस्तृत दलीलें सुनने का समय निर्धारित किया है। पिछले 6 साल से जारी इस कानूनी गतिरोध को समाप्त करने के लिए न्यायालय ने अपनी तैयारी पूरी कर ली है।

​कानूनी प्रक्रिया और नवीन हस्तक्षेपों पर प्रतिबंध

​न्यायालय ने इस महत्वपूर्ण मामले की सुचारू सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए कुछ कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। वर्तमान सुनवाई के दौरान अब किसी भी नए पक्षकार को हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि नए आवेदनों पर रोक लगाकर केवल पूर्व से शामिल पक्षों की दलीलों और दस्तावेजों के आधार पर ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा। इस कदम का मुख्य उद्देश्य सुनवाई में किसी भी प्रकार के अनावश्यक विलंब को रोकना और समय सीमा के भीतर कानूनी निष्कर्ष पर पहुंचना है।

​छह वर्षों का अंतराल और प्रभावित नियुक्तियां

​यह विवाद वर्ष 2019 से चला आ रहा है जब प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का निर्णय लिया गया था। इस निर्णय के बाद से ही विभिन्न भर्ती परीक्षाओं के परिणाम और नियुक्तियां तकनीकी रूप से उलझ गई हैं। लोक सेवा आयोग से लेकर अन्य सरकारी विभागों की भर्ती प्रक्रियाएं इस कोर्ट केस के अंतिम फैसले के अधीन हैं। 6 साल के इस लंबे अंतराल के दौरान कई बड़ी परीक्षाएं आयोजित की गईं, लेकिन सफल अभ्यर्थियों की पूर्ण नियुक्ति और वेतन निर्धारण आरक्षण के इसी गणित पर टिका हुआ है।

​अभ्यर्थियों की उम्मीदें और प्रशासनिक संवेदनशीलता

​प्रदेश के लाखों शिक्षित बेरोजगारों के लिए यह तीन दिन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान में कई विभागों में 87-13 प्रतिशत के फॉर्मूले के आधार पर नियुक्तियां की जा रही हैं, जिससे बड़ी संख्या में पद होल्ड पर रखे गए हैं। उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद इन रुके हुए परिणामों का रास्ता साफ होने की संभावना है। प्रशासन और विधिक विशेषज्ञ भी इस मामले को देख रहे हैं क्योंकि कोर्ट के निर्णय के बाद राज्य की आरक्षण नीति और भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

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